कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय-३ ] [ ४०३
और एक हज़ार दिव्य वर्षों का कलियुग होता है ।१३। इन चारो युगो
का सध्याक्रम ( संधिकाल ) क्रमश चार सौ, तीन सौ, दो सौ, और एक
सौ वर्ष का होता है । इन चारो युगो की शेष सध्या का क्रम भी इसी
प्रकार समझना चाहिये ।१३।
एकसप्ततिकं तत्र युगं भुङ्क्ते मनुर्भुवि ।
मनूनामपि सर्वेषामेव परिणतिर्भवेत् ।
दिवा प्रजापतेस्तत्तु निशा सा परिकीर्त्तिता ।१४
अहोरात्रञ्च पक्षस्ते माससंवत्सरर्तवः ।
सद्गुणाधिकृतं कालो ब्रह्मणो जन्ममृत्युकृत् ।१५।
शतसंवत्सरे ब्रह्मा लय प्राप्नोति हि त्वधि ।
लयान्ते त्वन्नाभिमध्यादुत्थितः सृजति प्रभुः ।१६।
तत्र कृतयुगान्तेऽहं कालं सद्धर्म्मपालकम् ।
कृतकृत्याः प्रजा यत्र तन्नाम्ना मां कृतं विदुः ।१७।
इति तद्वच आश्रुत्य कल्किर्निजजनावृतः ।
प्रहर्षमतुलं लब्धा श्रुत्वा तद्वचनामृतम् ।१८।
अवहित्यमुपालक्ष्य युगस्याह जनान्हितान् ।
योद्धुकामं कलेः पुर्यां हृष्टो विशसने प्रभुः ।१६,
गजरथतुरगान्नरराँश्च योधाम्कनकविचित्रविभूषणा-
चिताङ्गान् । धृतविविधवरास्त्रशस्त्रशूगान्गुधिनिपु-
णानगरायध्वमानयध्वम् ।२०।
प्रत्येक मनु इकहत्तर चतुर्र्युगी तक पृथिवी को भोगते है ।
इसी प्रकार सब मनु बदलते रहते हैं । चौदहवे मनु जितने समय तक
पृथिवी का भोग करते हैं, उतना समय ब्रह्मा का एक दिवस होता है ।
इतने ही परिमाण की ब्रह्मा की एक रात्रि होती ।१४। इसी प्रकार
दिवस-रात्रि, पक्ष, मास, सवत्सर और ऋतु आदि की उपाधि से
ब्रह्माजी की जन्म-मृत्यु आदि का विधान होता है ।१५। ब्रह्मा अपनी
सौ वर्ष की आय पूर्ण होने पर वह स्वय मे लय हो जाते है । फिर