कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ें३७६ ] [ कल्कि पुराण
तेन खड्गेन महता दाक्ष्यं निर्भिद्य बन्धुभिः ।
बलिभिर्भ्रातृभिर्बाह्वैर्वृतः शस्त्रास्त्रपाणिभि ॥३६॥
बहिर्बभूव सर्वेश कल्कि. कलकविनाशनः ।
सहस्राक्षौ यथा वृत्रकुक्षित् दम्भोलिनेमिना ॥३७॥
यानि रध्राद्गजरथस्तुरगाश्चाभवन्बहिः ।
नासिकाकर्णविवरान्क र्दाप तस्या विनिर्गताः ॥३८ ॥
ते निर्गतास्ततस्तस्या सैनिका रुधिरोक्षिताः ।
ता विव्यधुर्निक्षिपन्ती तरसा चरणौ करौ ॥३६॥
ममार सा भिन्नदेहा भिन्नकुक्षिशिरोधरा ।
नादयन्ती दिशो घो. ख चूणयन्ती च पर्वतान् ॥४०॥
जैसे देवराज इन्द्र वृत्रासुर की कुक्षि को अपने वज्र से भेद कर
बाहर आये थे, वैसे ही सर्वेश्वर एव पापो का नाश करने वाले कल्कि-
जी ने अपनी वृहद् तलवार से राक्षसी की दक्षिण कुक्षि चीर डाली
और अपने शस्त्रास्त्र धारी बाधवो के सहित बाहर निकल आये ॥ ३६-
३७ ॥ बहुत से गज, अश्व रथ और पैदल उसके अधो मार्ग मे और
बहुत से उसके कानो तथा नासिका छिद्रो से होकर बाहर आ गये । ३८॥
फिर वे रक्त से भीगे हुए वीर गण राक्षमी के देह से बाहर निकल कर,
को हाथ-पैर चलाती देख कर बाणो द्वारा उसका वेधन करने लगे
॥३६॥ जब उसके उदर मस्तक तथा अन्यान्ध अग छिन्न-भिन्न होने
लगे तब उसकी घोर चीत्कार से दशों दिशाएं गूँज उठी । फिर वह
पर्वतो पर गिर कर उन्हे चूर-चूर करती हुई मृत्यु को प्राप्त हुई ॥४०॥
करञ्जोऽपि तथा वीक्ष्य मातरं कातरोऽभवत् ।
स विकञ्ज क्रुधा धावन्सेनामध्ये निरायुध ॥४१॥
गजमालाकुलो वक्षोवाजिराजिविभूषण ।
महासर्पकृतोष्णीशः केसरीमुद्रिताङ्गुलिः ॥४२॥
ममद्द कल्किसेना ता मातुर्व्यसनकर्षितः ।
स कल्किरत्त ब्राह्ममस्त्र रामदत्त जिघासया ॥४३॥