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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३७१
एक स्तनं पाययति विकुञ्जं पुत्रमादरात् ।
न जानेऽस्याः शरीरस्य प्रमाणं कति वा भवेत् ॥१९॥
बलं वास्या निशाचर्या इत्यूचुर्विस्मयान्विताः ।
कल्किः परात्मा सन्नह्य सेनाभि सहसा ययौ ॥२०॥
हे प्रभो ! हे कल्के ! इम पयस्विनी नदी की उत्पत्ति के विषय
मे कहते है, इसे सुनिये । उस कुथोदरी नाम की राक्षसी के स्तनो स
निकला हुआ दूध हिमालय पर्वत से गिरता हुआ नदी रूप मे बह रहा
है ।। १६ ।। हे महामते ! सात घडी के पश्चात् इसी प्रकार को एक
अन्य पयस्विनी नदी प्रवाहित होगी । इसके पश्चात् यह नदी सूख कर
तटाकार मे परिवर्तित हो जायगी ।।१७।। सेना सहिन सुशोभित कल्कि जी
मुनियो के वचन सुनकर बोले- अहो, कैसे विस्मय का विषय है कि
राक्षसी के स्तनो से निर्गत हुए दुग्ध से इतनी बडी नदी उत्पन्न होकर
बह रही है ।।१८।। वह अपना एक स्तन अपने पुत्र विकुन्ज को पिला
रही है तो इसके देह का परिमाण क्या होगा ? यह किस प्रकार जाना
जा सकता है ? ।।१९।। तब सभी आश्चर्य मे भर कर बोल उठे--
अहो ! इस राक्षसी मे कितना बल है ? तदनन्तर सेना से सुसज्जित
हुए कल्कि जी उस राक्षसी की ओर चल पडे ।।२०।।
मुनिदर्शितमार्गेण यत्रास्ते सा निशाचरी ।
पुत्रं स्तनं पाययन्ती गिरिमूर्द्धिनं घनोपमा ॥२१ः
श्वासवातातिवातेन दूरक्षिप्तवनद्विपाः ।
यस्याः कर्णबिलावासं प्रसुप्ताः सिंहसुकुलम् ॥२२।
पुत्रपौत्रपरिवृता गिरिगह्वरविभ्रमाः ।
केशमूलमुपालम्ब्य हरिणा शेरते चिरम् ।। २३ ।।
यूका इव न च व्यग्रा लुब्धजातशङ्कया भृशम् '
तामालोक्य गिरेर्मूर्ध्नि गिरितत्परमाद्भुताम् ॥२४॥
कल्किः कमलपत्राक्षः सर्वांस्तानाह सैनिकान् ।
भयोद्विग्नान्बुद्धिहीनांस्त्यक्तोद्यमशमपरिच्छदान् ॥२५॥