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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 442 में से

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पृष्ठ 423

प्राणियों के पृष्ठों में न्यास करे । शेष भाग में वषट्कार अस्त्र न्यास
करना चाहिए । हृदय आदि छः अंगों में पूर्व की ही भाँति क्रम से न्यास
करे । अंगुष्ठ जिनके आदि में हो ऐसे उक्त वर्गों से क्रम से उसी प्रकार
छहों से करे ।
फिर उसी प्रकार से पाद, जानु, सक्थि, गुह्य और दोनों पाश्र्वों
तथा वस्ती में पूर्व की ही भाँति अक्षरों के द्वारा क्रम से मन्त्रों का न्यास
करना चाहिए । दोनों बाहुओं में, दोनों हाथों में, कटि में, नाभि में,
जठर में, दोनों स्तनों में उसी प्रकार छहों के द्वारा विन्यास का समाचरण
करे । मुख में, चिबुक में गण्ड में, दोनों कानों में, ललाट में, दोनों
आँखों में, कक्ष में, षड्वर्गों में पूर्व की ही भाँति न्यास करना चाहिए ।
रोक कूप में, ब्रह्मरन्ध्र में, गुदा में, दोनों जंघाओं में, नखों में, दोनों
हाथों में और पादों में उसी क्रम से पूर्व की ही भाँति समाचरण करना
चाहिए । इस रीति से जो श्रेष्ठ मनुष्य मातृकाओं का न्यास करता है वह
समस्त यज्ञ पूजाओं में पूत (पवित्र) और योग्य हो जाया करता है ।
इससे परम श्रेष्ठ मन्त्र कहीं पर भी विद्यमान नहीं है । जो सब कामनाओं
का देने वाला, पुण्यमय और चारों वर्गों का प्रदान करने वाला है ।
वाग्देवता का हृदय में ध्यान करके और सब अक्षरों की मूर्तियों का
ध्यान करके तीन बार क्रम युक्त मातृका मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर जल
का पान करे ।
वह वाग्मी, पण्डित, श्रीमान् और श्रेष्ठ कवि हो तो जाता है । बुद्ध
पुरुष को चाहिए कि पूर्व में चन्द्र बिन्दु से युक्त स्वरों को पढ़े । इसके
पीछे केवल समस्त व्यञ्जनों को पढ़ना चाहिए । अकार से आदि लेकर
क्षकार के अन्त तक को पूरक श्वासों से पढ़े । जल करतल में लेकर
अक्षरों की संख्या को पढ़कर उस जल को अभिमन्त्रित करके प्रथम
पूरकों के द्वारा पान करे । द्वितीय को कुम्भकों से तथा तृतीय को
रेचकों से करे । इस प्रकार से करके विचक्षण पुरुष जल को पीकर,
वह दृढ़ अंगों वाला, पण्डित और पुत्र-पौत्रों से समन्वित हो जाता है ।
मातृका मन्त्रों से मन्त्रित करके जल को तीनों सन्ध्याओं में पीना चाहिए ।