सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 292

२९४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
अक्षर बीज है और यकार शक्ति कही जाती है । हे भैरव! बीज के
सहित मन्त्र कह दिया गया है और अब कल्प का श्रवण करो । किसी
तीर्थ में, नदी में, देहवात में, गत्र्त आदि में, परकीय से इतर जल में पूर्व
में स्नान करे । आचमन करके शुचिता को प्राप्त हुआ होकर आवास
का परिग्रह करे । उत्तर दिशा की ओर अभिमुख होकर फिर स्थण्डिल
का मार्जन करना चाहिए । जिसको वह स्वयं क्षिति से इस मन्त्र के द्वारा
कर से करे । 'ॐ ह्रीं' इस मन्त्र के द्वारा और आशापूरक के जलों के
द्वारा भूतों के अपसारण करने में अभ्युक्षण करे । फिर सव्य हाथ से
शुचि होकर स्थण्डिल का ग्रहण करके सुवर्ण की लेखनी से अथवा
याज्ञिक कुशा से मन्त्र को लिखना चाहिए । अथवा 'ॐ वैष्णव्यैः नमः'
इस मन्त्र राज को लिखे फिर उसी से समरेखा से त्रिमण्डल करे ।
नित्य होने वाली पूजाओं में रज से मण्डल को नहीं लिखना
चाहिए । पुरश्चरण कार्यों में और काम्यों में और इनके अनन्तर पश्चिम
में फिर इसके पीछे दक्षिण में पीछे, शेष में पूर्व भाग में करे । इसी
प्रकार से वर्णों के द्वारों के निहित क्रम होता है । 'ॐ ह्रीं' इस मन्त्र
मण्डल के द्वारा फिर दिग्बन्धन करे । यथाक्रम से पूर्व में कथित आशा
बन्धन से ही करे । यहाँ पर भी फट् जिसके अन्त में हैं, अपने कर से
ही निबन्ध करे । यवों के मण्डलों से और आठों से एक अंगुल होवे ।
अदीघ्र योजित हाथों से चौबीस अंगुलों से उस भ्रमण वाले हाथ से
एक-एक उसका मण्डल होता है । एक बालिस्त मात्र पद्म होता है
और उससे आधा कर्णिकार है । इसके दल परस्पर में सक्त होते हैं और
आयत हों, ऐसे ही नियोजित करे । न्यूनाधिक भाग में द्वार का न्यास
करे । ठीक मध्य भाग में द्वार का न्यास करे न्यून तथा अधिक में न
करे और सुबद्ध मण्डल रक्तवर्ण वाला विचिन्तन करें । इससे
अन्यथा इसका उग्र मण्डल जो लक्षण और भागरहित किया करता है
और न अभीष्ट काम की होता है । इससे यह मण्डल यहाँ पर
लिखना चाहिए ।