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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 442 में से

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पृष्ठ 288

२९० ऒ श्रीकालिका पुराण ऒ
हैं और आप परेश पुरुषोत्तम हैं, आप कूटस्थ, जगत् में व्याप्त रहने
वाले प्रधान परमेश्वर हैं । आप रूपात्मा हैं, आप महातत्त्व हैं, तत्त्व
ज्ञान के आलय हैं, प्रभु हैं, आप सांख्य योग के आलय हैं, शुद्ध और
तीन गुणों (सत्त्व-रज-तम) के विभाग के ज्ञाता हैं । आप एक और
अनेक रूप वाले हैं, शान्त चेष्टा से संयुक्त और जगन्मय हैं ।
आप विकारों से रहित, निराधार, नित्य ही आनन्द स्वरूप हैं तथा
सनातन हैं । आप विष्णु हैं, आप महेन्द्र हैं और आप ब्रह्मा तथा जगत्
के स्वामी हैं । जो रूप और रूपेश्वर रत्नों की माता हैं, सम्भूति से भूत
और निरवग्रह हैं, जो काक्ष्यावतीर्ण अवगत प्रभा भी हैं, योगेश्वर, ज्ञान
के गति वाले और अगम्य अर्थात् न जानने के योग्य हैं । आप प्रेमरूप
आत्मा के धराराम हैं, आप भोगीन्द्रों से बद्ध अमृतभोग तन्त्र वालें हैं ।
आप सूक्ष्म और अक्षर हैं, तत्वों के वेत्ता और अप्रमाथी हैं । आप देवों
के भी देव और सुरगणों के रक्षक हैं । आप विकल्प और मान से
परिहीन देह वाले हैं, आप शुद्ध अन्तधाम और अनुगतों की एक
विद्यारूप हैं । आप वर्धिष्णु, उग्र पुरुष और परमात्मा हैं, आप इन्द्रियों
के समूह की विचार बुद्धि हैं । आप नाथों के भी नाथ हैं, परों के
प्रभाव अर्थात् उत्पत्ति स्थान हैं, आप मुनिगणों की गति हैं तथा योनियों
के द्वारा जानने योग्य हैं । आप भूधर हैं, भागधर और अनन्त हैं । वे
विश्वात्मा, आपके बहुत से प्रपञ्च हैं । आप ज्ञानरूपी अमृत के स्पन्दन
करने वाले पूर्ण चन्द्रमा हैं और मोहरूपी अन्धकार के परम प्रदीप हैं ।
आप भक्तों के पुत्रों के परम पिता हैं और कोप में पञ्चानन के रूप
को धारण करने वाले हैं । आप समस्तों के समुदायों का विस्तार किया
करते हैं । आप ब्रह्मा के रूप से सृष्टि किया करते हैं और आप ही
भगवान् विष्णु के रूप के द्वारा परिपालन निरन्तर किया करते हैं ।
आप ही गुरुदेव के रूप से इस जगत् का अन्त किया करते हैं ।
इस जगत् में आपसे अन्य कुछ भी वस्तु नहीं हैं । आप चन्द्रमा हैं और
आप ही सूर्य हैं । आप ही अग्नि हैं, जल हैं, पवन हैं और आप ही
धरित्री हैं । आप ही नभ हैं और आप ही ऋतु के तन्त्र होता हैं, आप