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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 442 में से

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पृष्ठ 271

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २७३
होने पर अग्नि के समान आत्मा वाले श्रीमान् और्व मुनि नृप का
अभिनन्दन करने के लिए आये थे । उन मुनिवर का दर्शन करके जो
जलती हुई अग्नि के सदृश थे, राजा सगर ने उनका अभ्यर्चन किया
था । अर्घ्यपूर्वक पाद्य और आचमनीय देकर उन मुनिश्रेष्ठ को राजा ने
श्रेष्ठ आसन पर निवेशित किया था । फिर उस सागर राजा ने महात्मा
और्व से समुचित रीति से प्रणाम करके पूछा था कि आपका कुशल
तो हैं । और मुनि श्रेष्ठ ने कहा था कि हे नरराज, मेरा सदा ही सर्वत्र
कुशल है । मैं आपका दर्शन करने के लिए कुशलता के साथ उत्साह
कराता हूँ ।
आप समस्त राजाओं में कुशाली हैं जिस एक ने ही आने पर बहुत
शीघ्र ही समस्त राजाओं को जीत लिया था । हे राज नरोत्तम! आपका
कुशल नित्य ही बढ़े । हे भूपते! नीति के अनुसार सद् आचरणों के
द्वारा पृथिवी का शासन करिये । आपके समृद्ध होने पर जगत् की वृद्धि
है अतएव उसी भाँति आप वृद्धि के लिए ही चेष्टा करिये जैसे चन्द्र
की वृद्धि हुआ करती है । हे नृप! सबसे प्रथम सद्गुणों से समन्वित
अपनी आत्मा को योजित करिये । इसके उपरान्त उसके गुणों से
समन्वित भार्या को महिषी बनाइये । यदि वनिता को नित्य ही संयोजित
किया जावे तो वह स्वयं ही अपने गुणों के विषय में प्रवेक्षण करने
वाली होती हुई महती और व्रतधारण करने वाली हो जाती है । ऐसा
सुना जाता है कि शम्भु में संगम सम वाली होती हुई हिमवान् की पुत्री
बहुत सी क्रिया और अभ्युपायों के द्वारा शम्भु के द्वारा प्रायोजित कही
गई थी । इसके अनन्तर शम्भु के अत्यधिक प्रेम से सती पार्वती ने
उनकी ही अनुमति से उनके आधे शरीर का हरण कर लिया था । तभी
से भगवान् शंकर अर्धनारी श्वर हो गये थे । हे नृप शार्दूल! उन्होंने फिर
अन्य भार्या का ग्रहण नहीं किया था । इस कारण से, हे राजेन्द्र! आप
भी अपनी जाया को उत्तर आत्मा से गुणों के द्वारा संयोजित कीजिये
उसके उपरान्त लघु सुत को संयोजित करें ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-राजा सगर भी इस और्व के द्वारा भाषित