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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 442 में से

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पृष्ठ 265

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६७
जप किया और सदा तप किया था । आपने यह सब करके बड़ी भारी
कीमत के द्वारा मुझे खरीद लिया है । अब मैं आपका दास गया हूँ मुझे
नियोजित कीजिए । आप अपने अंग-संस्कार करके जटाओं के प्रसाधन
में मेरा नियोजन करें । शरीर से वल्कल को हटाकर सुन्दर वस्त्रों का
निवेशन करने में, हार नूपूर और काञ्ची आदि के परिधान करने में, हे
शुभे! शीघ्र ही नियोजित करिए । मैंने जो कामदेव को दग्ध कर दिया
था वह भस्म रूप से मेरे शरीर में स्थित है । मेरा प्रतिकार करके ही
मुझे तुम्हारे ही सामने दग्ध कर देना चाहता है । हे मनोवर! अपने अंग
के अमृत के दान के द्वारा उस कामग्नि से मेरा उद्धार करिये । हे दरिते!
मेरे ऊपर प्रसन्न होइये ।
काली-हर समागम वर्णन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- भगवान् शम्भु ने वचन का श्रवण कर
गिरिजा अत्यन्त हर्षित हो गई थी और उसने उस समय में शम्भु को
अपना प्राप्त हुआ पति मान लिया था । काली ने सखी के मुख से
भगवान् शंकर से कहा था । जिस रीति से शम्भु सुनने की इच्छा करते
हुए वाक्य का श्रवण कर रहे हैं। यहाँ पर सन्धि में अति भेद से
सज्जक प्रवृत्त नहीं होते हैं । शंकर हर मर्यादा से मेरे उस पाणि का
ग्रहण करें । कन्या पिता के द्वारा दत्त हुआ करती है तप से दत्त (दी
हुई) नहीं होती है । इससे हिमवान् पिता की भली भाँति प्रार्थना करके
भगवान् हर वैवाहिक विधि से ही मेरे पाणि का ग्रहण करें । मार्कण्डेय
महर्षि ने कहा- इसके अन्तर काली लज्जा से समन्वित होती हुई विराम
को प्राप्त हो गई थी । उस अवसर पर भगवान् शम्भु ने भी उसके वचन
को सर्वथा सत्य और तथ्य एवं उचित ही ग्रहण किया था । इसके
उपरान्त भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित ही वहाँ निवास करने लगे
थे । जिस प्रकार से पहले रहते थे उसी भाँति इस समय भी उस
गंगावतरण शिखर पर रहते थे । वह काली अपनी सखियों के साथ
घिरी हुई अपने पिता के घर में चली गयी । वह सती दीन होती हुई