कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६३
ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ
हुई तीव्र तप का समाचरण कर रही है । तीन सहस्त्र वर्ष हुए यह
भामिनी तपस्या कर रही हैं किन्तु भगवान् शंकर इस गिरिजा की पुत्री
को प्राप्त नहीं हो रहे हैं ।
भगवान् शंकर सर्वत्र गमन करने वाले परमेश्वर देवों, मुनिगणों
और तपस्वियों के द्वारा कहे जाया करते हैं । क्या वे इसको नहीं जानते
हैं । क्या वे पर्वत के शिखर पर विराजमान नहीं है ? यह आज इसी
चिन्ता में दुःखित हैं और इसको सुख प्राप्त नहीं हो रहा है । हे सुव्रत!
आप भगवान् शंकर से इसका संगम कर दीजिए । उस द्विज ब्रह्मचारी
ने उस समय उसके इस वचन का श्रवण करके मुस्कराते हुए उस
पार्वती को यह वचन बोला था । ब्राह्मण ने कहा-मैं अमोघ दर्शन
वाला हूँ और मैं भगवान् हर को लाने के लिए भी समर्थ हूँ । किन्तु मैं
आज एक बात कहता हूँ-मेरे निश्चित मत का श्रवण करिए । मैं
महादेवजी का जानता हूँ, मैं उनको बोल भी दूँगा किन्तु मुझ से सुन
लो, वृषभध्वज महादेव विभूति के वेष वाले हैं और जटाधारी हैं । वे
बाघम्बर के वस्त्र धारण करने वाले, एकाकी और मृग के चर्म से ढके
हुए रहते हैं । वे कपालों को धारण करते हैं तथा सर्पों के समुदायों से
वेष्टित रहा करते हैं ।
उन शम्भु का गला विष से दग्ध हो रहा है उनके तीन नेत्र हैं-वे
विरूपाक्ष हैं और विभीक्षण हैं अर्थात् विशेष रूप से भयंकर हैं । उनका
जन्म भी अव्यक्त है अर्थात् उनके जन्म से विषय में कुछ भी किसी को
ज्ञान नहीं है वे निरन्तर गृहस्थाश्रम के भोग से रहित हैं । शंकर ज्ञानिजन
तथा बन्धुजनों से हीन हैं और भक्ष्य भोज्य से भी वर्जित हैं । शम्भु
निरन्तर श्मशान में निवास करने वाले हैं और संग से परिवर्जित रहा
करते हैं । गर्जन करने वाले, विकृत स्वरूपधारी और तीक्ष्ण भूत गणों
से सदा घिरे हुए रहा करते हैं । शंकर श्रृंगार रस से रहित हैं तथा उनके
न कोई भार्या है और न पुत्रादि ही हैं । किस कारण से आप उनको
अपना भर्त्ता बनाना चाहती हैं । मैंने पूर्व में होने वाला भी उनका एक
दूसरा कृत्य सुना है । आप उसका श्रवण करिये मैं आज आपको