कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें௬ श्रीकालिका पुराण ௬ २१९
और अट्टहास से युक्त भैरव हुआ करते हैं और वे महादेव इस प्रकार
से भैरव के स्वरूप को धारण करने वाले हैं । महान् भुजाओं वाले वे
मध्य शरम्भ काय के द्वारा काम को धारण करते थे । वह देव फिर हर
के प्रथमों की ओर गये थे । वह भैरव अपने गणों के साथ आकाश में
क्रीड़ा किया करते हैं ।
कामाख्या देवी वर्णन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह श्रीमान् राजा नरक जो चिरंजीवी
और महान् भुजाओं वाला था । मानुष भाव से ही चिरकाल पर्यन्त
राज्य किया था । त्रेता युग के व्यतीत हो जाने पर द्वापर के शेष में
शोणितपुर में वाण नाम वाला महान् असुर हुआ करता था । उसका
अग्नि दुर्ग नगर तथा और वह बलवान् शम्भु का सखा था । उसकी
एक सहस्त्र बाहु थीं और वह बहुत दुर्धर्ष था तथा राजा बलि का प्रिय
पुत्र था । उसकी नरक के साथ बड़ी मित्रता हो गई थी । नित्य ही गमन
और आगमन से तथा परस्पर अनुग्रह से उन दोनों में पवन और अनल
की भाँति महती प्रीति हो गई थी । उस बाण ने जगत के प्रभु भगवान्
शम्भु की समाराधना की थी और वह बिना भय वाला होकर असुर
भाव से विचरण किया करता था ।
हे द्विजो! वह फिर ब्राह्मणों का पूजन नहीं करता था जैसे कि
पहले भी नहीं किया करता था और वह यज्ञों और दान देने में भी पूर्व
भी भाँति प्रसन्न नहीं होता था । पूर्व की तरह भगवान् विष्णु के समीप
गमन नहीं किया करता था और वह पृथ्वी का भी अर्चन नहीं करता
था । उस अवसर पर कामाख्या में उस भाँति की भक्ति उसकी नहीं हुई
थी । इस बीच में विधाता के पुत्र मुनियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ कामाख्या का
दर्शन करने के लिए प्राग्ज्योतिष पुर में गये थे । दुर्ग के अन्दर
व्यवस्थित उस नीलकूट देवी का दर्शन करने के लिए जाने को वसिष्ठ
मुनि को नरक की निन्दा करते हुए कठोर वचन बोले । वसिष्ठ मुनि
ने कहा- कैसे पृथ्वी का पुत्र और वराह का सुत अचानक ही ब्राह्मण