कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हित सम्पादन करने के लिए और भगवान् शंकर की सेवा के लिए
समुत्पन्न हुए थे । वाराह के गणों को देखकर तथा नृसिंह हरि को
अवलोकित करके स्वयं शरभ के स्वरूप वाला होता हुआ और ध्यान
करते हुए उस समय में नाद किया था ।
उनके सीकरों से ( जल कणों से ) जो उत्पन्न हुए थे इसी कारण
से उनके स्वरूप भी बहुत थे । क्रूर दृष्टि से, क्रूर गति से, क्रूर युद्धों
से, क्रूर कृत्यों से वाराह के इन गणों का हनन करने वाले थे क्योंकि
भगवान् कपर्दी (शिव) ने कहा है । अतएव वे क्रूर कर्मों के करने
वाले और भयंकर समुत्पन्न हुए थे । वे महान ओज वाले सदा क्रूर हैं ।
वे कर्मों को नहीं किया करते हैं । दृष्टिमात्र से ही वे क्रूर हैं वे कार्यों
से क्रूर नहीं थे । वे फल, पुष्प, जल, पाक तथा मूल को भोग करते
हैं । वनों पर्वतों की शिखरों में फलादि जो निवेदित किये जाते हैं उनका
ग्रहण करते हैं और आहरण करने के जो पत्र पुष्पादिक हैं उनका
प्राशन किया करते हैं । भर्ग का जो भोग होता है उसी भोग वाले वे
महान ओज वाले भी थे । चैत्र की चतुर्दशी को छोड़कर वे आमिषों का
प्राशन नहीं किया करते हैं । फिर सब गण भी वहाँ पर आमिषों का
उपभोग किया करते हैं ।
वाराह के गणों के निहत हो जाने पर वे गण मार्ग के समीप में
पहुँचकर स्वयं चारों भागों वाले होकर भूतकर्म का गान करते थे । चार
भाग वाले में उनका भूतत्व उस समय में हो गया था । जो पूर्व में लोक
और वेद में विदित भूतग्राम चार प्रकार का था क्योंकि यह उनसे भी
अधिक था । अतएव वह भूतग्राम कहा जाया करता है । यह सब
आपको बतला दिया है जिस तरह से शम्भु के गणभूत हैं । वे जो भी
आहार वाले हैं, जैसे आकार वाले हैं और जो कृत्य करने वाले हैं वे
महान ओज से युक्त हैं । जो इस महान् अद्भुत आख्यान का नित्य
श्रवण किया करता है वह दीर्घ आयु वाला, सदा उत्साह से सम्पन्न
और योग से युक्त होता है ।