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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 442 में से

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पृष्ठ 142

Ꮚ श्रीकालिका पुराण Ꮚ १४३
करती थी वैसा ही नाम की प्राप्ति उसने की थी । उन मुनि ने यज्ञ को
समाप्त करके कृतकृत्य भाव को प्राप्त किया था और तनया के प्रलम्भ
से वे सम्मदयूत हुए थे । उस अपने आश्रम के स्थान में अपने शिष्य
वर्गों के सहित महर्षि उसी अपनी तनया को प्यार किया करते थे और
निरन्तर उसी को प्रिय बना लिया था ।
वशिष्ठ अरुन्धति विवाह
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर वह देवी उन मुनिवर के
आश्रम में बड़ी हो गई थी जो कि चन्द्रभागा नदी के तट पर तापसारण्य
नाम वाला था । जिस प्रकार से चन्द्रमा की कला शुक्लपक्ष में नित्य
ही प्रवर्द्धित हुआ करती है जैसे ज्योत्सना बढ़ा करती है उसी भाँति वह
अरुन्धती भी वृद्धि को प्राप्त हुई थी । उस समय में पाँचवा वर्ष के
सम्प्राप्त होने पर गुण गुणों के द्वारा उस सती चन्द्रभागा ने भी उस ताप
सारण्य को भी परम पवित्र कर दिया था । वहाँ पर मेधातिथि द्वारा
निषेचित महापुण्य वाला तीर्थ था जो अरुन्धती की क्रीड़ा का स्थान था
और उन अरुन्धती ने बाल्योचित कृत्य से पूत किया था । आज भी
तापसारण्य में चन्द्रभागा नदी के जल में मनुष्य अरुन्धती तीर्थ के जल
में स्नान करके अन्त में हरि की प्राप्ति किया करता है । कार्तिक के पूरे
मास में चन्द्रभागा नदी के जल में स्नान करके विष्णु भगवान के लोक
में प्राप्त होकर अन्त में मोक्ष की प्राप्ति किया करता है । माघ मास में
पूर्णमासी अथवा अमावस्या में उसी भाँति चन्द्रभागा के जल में स्नान
करता है और एक-एक बार ही किया करता है ।
उस पुरुष के वंश में महारोग कभी भी नहीं होगा । देह के अन्त
में वह पुरुष चन्द्र भवन को जाकर फिर वह भगवान हरि के लोक में
चला जाया करता हैं । जब पुण्य का क्षय हो जाया करता है तभी यहाँ
संसार में आकर अर्थात् पुनः जन्म ग्रहण करके वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण
होता है । चन्द्रभागा नदी का जल पीकर वह मनुष्य चन्द्रलोक को प्राप्त
किया करता है । विधि के साथ एक बार स्नान करके अयुत (दस