कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
चौपाई-सुवा पढायो सुगुरु बनाय । करम बनहिं जिन जइयो
भाय ॥ भूले चूके कबहुं जो जाहु । लोभ नलनिपै दगा न खाहु
॥ ४ ॥ दुर्जन मोह दगाके काज । बांधी नलनी तर धर नाज ॥
तुम मति बैठहु सुवा अजान । नाज विषय सुख लहिं तिहिं
थान ॥ ५ ॥ जो बैठहु तो पकड़ि न रहियो । जो पकड़ो तो दिठ
मति गहियो ॥ जो दिठ गहो तो उलटि न जइयो । जो उलटो
तो तजि भगि जइयो ॥ ६ ॥ यहि विधि सुवा पढायो नित ।
सुवटा पठिके भयो बिचित्त ॥ पढत रहै निशि दिन यह बैन ।
सुनत लहै सब प्रानी चैन ॥ ७ ॥ इक दिन सुवटे आई मने ।
गुरु संगति तजि भजिगे बने ॥ बनमें लोभ नलनि अति बनी ।
दुर्जन मोह दगाको तनी ॥ ८ ॥ ता तरु विषय भोग अन धरे ।
सुवटे जान्यो ये सुख खरे ॥ उतरे विषय सुखनिके काज । बैठि
नलनिपै बिलसै राज ॥ ९ ॥ बैठो लोभ नलनिपै जबै । विषय
स्वाद रस लटके तबै ॥ लटकत तरे उलटिगे भाव । तर मूंडी
ऊपरभै पाँव ॥ १० ॥ नलनि दिठ पकरे पुनि रहै । सुखते बचन
दीनता कहै ॥ कोउ न बनमें छुडावनहार । नलनी पकरहिं करहिं
पुकार ॥ ११ ॥ पढन रहै गुरुके सब बैन । जे जे हितकर सिखवये
ऐन ॥ सुवटा बनमें उड़ि जनि जाहु । जाहु तो भूलि खता मति
खाहु ॥ १२ ॥ नलनीके मति जइयो तीर । जाहु तो तहाँ न बैठो
कीर ॥ जो बैठो तो दिठ मति गहो । जो दिठ गहो तो पकरि
मत रहो ॥ १३ ॥ जो पकरो तो चुगा न खेहो । जो खाओ तो
उलटि न जैहो ॥ जो उलटो तो तजि भगि जैहो । इतनी सीख
हृदयमें लहिहो ॥ १४ ॥ ऐसे बचन पढत पुनि रहै । लोभ नलनि
तजि भजौ न चहै ॥ आयो दुर्जन दुर्मति रूप । पकड़ि लयो