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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(९३०)

कबीरपंथी—

पूजा तिन जहंढाया ॥ टेक ॥ अंड न पिंड प्रान नहिं देहा ।
काटि काटि जिव केतिक एहा ॥ बकरी मुर्गी कीन उछेहा ।
आगिल जनम उन अवर लेहा ॥ कहहिं कवीर सुनो जन लोई ।
भुतवाके पुजले भुतवे होई ॥ १०६ ॥

शब्द ४९४—भैवर उड़े बग बैठे आया । रैन गयी दिवसो चलि
जाया ॥ हल हल कांपे बाला जीव । ना जानो का करिहै पीव ॥
कांचे बासन टिकै न पानी । उडिगौ हंस काया कुंभिलानी ॥
काग उडावत भुजा पिरानी । कह कवीर यह कथा सिरानी ॥ १०६ ॥

शब्द ४९५—खसम विनु तेलिके बैल भयो । बैठत नाहिं साधुकी
संगति, नाधे जनम गयो ॥ टेक ॥ बहिबहि मरै पंचे निज स्वारथ,
जमके दंड सहो । धन द्वारा सुत राज काज हित, माथे भार गहो ॥
खसमहिं छाडि विषय रंग माते, पापके बीज बयो । झूठ मुकुति
नर आशु जीवनकी, प्रेतको जूठ खयो ॥ लख चौरासी जीव
जोइनमें शायर जात बहो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, स्वानकी
पूछ गहो ॥ १०७ ॥

शब्द ४९६—अब हम भैल बहिर जल मीना । पूरब जनम
तप कामद कीना ॥ टे० ॥ तब मैं अच्छलों बन बैरागी । तजलों
कुटुम्ब राम रट लागी ॥ तजलों काशी मैं मति भोरी । प्राननाथ
कटु को गति मोरी ॥ हम चलि गेलौ तुम्हरी सरना । कतहुँ न
देखलौ हरिजिको चरना ॥ हमहिं कुसेवक कि तुमहिं अयाना ।
दुइ महाँ दोष काहि भगवाना ॥ हम चलि गेल तुम्हारे पास ।
दास कवीर भल कैल निराशा ॥ १०८ ॥

शब्द ४९७—लोग बोले दुरि गये कवीर । या मति कोइ जाने
धीर ॥ टेक ॥ दशरथ सुत तिहुँ लोकहिं जाना । राम नामको
मरनमें आना ॥ जेहि जिय जान परा जस लेखा । रजुको कहै