कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 940, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(१२६)
कवीरपंथी
बहुतेरा पारब्रह्म नहि जाना ॥ बसिष्ठ सिष्ठ विद्या सम्पूर्ण राम
ऐसे शिष्य साखा । जाहि रामको करता कहिये तिनहुंको काल
न राखा ॥ हिन्दू कहै हमै ले जरवै तुलुक कहै मोर पीर । दूनौ
आइ दीनमों झगरेँ ठाढै देखैँ हंस कवीर ॥ ९० ॥
शब्द ४७९-जो देखा सो दुखिया देखा तन धरि सुखी न देखा
उदय अस्तकी बात कहत हौं ताकर करहु विवेखा ॥ टेक ॥ बाटे
बाटे सब कोइ दुखिया क्या गिरही वैरागी । शुक्राचार्य दुखहीके
कारन गरभै माया त्यागी ॥ जोगी दुखिया जंगम दुखिया
तापसको दुख दूना । आशा तृष्णा सब घट व्यापै कोइ महल
नहि सूना ॥ साच कहौं तो सबै जग खीझै झूठ कहो नहि जाई ।
कह कवीर तेई भै दुखिया जित यह राह चलाई ॥ ९१ ॥
शब्द ४८०-ता मनको चिन्हौ रे भाई । तन छूटै मन कहाँ
समाई ॥ टे० ॥ सनक सनन्दन जयदेव नामा । अम्बरीष प्रहलाद
सुदामा ॥ भक्त सही मन उनहुं न जाना । भगति हेतु मन उनहुं
न ज्ञाना ॥ भरथरि गोरख गोपी चंदा । ता मन मिलि मिलि कियो
आनन्दा ॥ जा मनको कोइ जान न भेवा । ता मन मगन भये
शुक्रदेवा ॥ एकल निरंजन सकल शरीरा । तासे भ्रमि भ्रमि रहल
कवीरा ॥ ९२ ॥
शब्द ४८१-बाबू ऐसो है संसार तिहारो ये कलि है व्यवहारा ।
को अब अनख सहे प्रति दिनको नाहिं न रहनि हमारा ॥ टे० ॥
सुमृति सुभाव सबै कोइ जाने हृदया तत्त्व न बूझे । निरजिव आगै
सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझे ॥ तजि अमृत विष काहे को
अंचवै गांठी बांधो खोटा । चोरनको दिये पाट सिंहासन साहुनको
कीन्हो ओटा ॥ कह कवीर झूठे मिलि झूठा ठगहीं ठग व्यवहारा ।
तीन लोक भरि पूरि रहो है नाहीं है पतियारा ॥ ९३ ॥