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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१२०)

कवीरपंथी—

यक सारा जी । पशुको मांस भखे सब कोई नलहिं न भखे
सियारा जी ॥ ८० ॥ ब्रह्मकुलाल मेदिनि भरिया उपजि बिनसि
कित गइया जी । मांस मछरिया जोपै खैया जो खेतनमें बोइया
जी ॥ माटीको करि देवी देवा जीव काटि काटि देइया जी । जो
तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लइया जी ॥ कहैं कवीर सुनो
हो सन्तो राम नाम नित लिया जी । जो कटु कियो जिह्वाके
स्वरथ बदल पराया देइया जी ॥ ७० ॥

शब्द ४५९—चात्रिक कहाँ पुकारै दूरी । सो जल जगत रहा
भरपूरी ॥ ८० ॥ जेहि जल नाद बिन्दुका भेदा । षट्कर्म सहित
उपान्यो वेदा ॥ जेहि जल जीव सीवका बासा । सो जल धरनि
अमर प्रकाशा ॥ जेहि जल उपजे सकल शरीरा । सो जल भेद
न जान कवीरा ॥ ७१ ॥

शब्द ४६०—चलहु का टेढो टेढो टेढो । दसौं द्वार नरकमें बूढे
तू गंधीको वेढो ॥ ८० ॥ फूटे नैन हृदय नहिं सूझे मति एको नहिं
जानी । काम क्रोध तृष्णाके मारे बूडि सुये विन पानी ॥ जारै देह
भसम हँ जाई गाडे कीम किट खाई । सूकर स्वान कागके भोजन
तनकी यहै बडाई ॥ चेत न देखु सुगुध नल बोरे तूते काल न
दूरी । कोटिन जतन करे बहुतरे तनकी अवस्था धूरी ॥ बालूके
घरवामें बैठे चेतत नाहिं अजाना । कह कवीर यक राम भजे विन
बूढे बहुत सयाना ॥ ७२ ॥

शब्द ४६१—फिरहु क्या फूले फूले फूले । जो दस मास उरध
मुख झूले सो दिन काहेक भूले ॥ ८० ॥ ज्यों माखी स्वादे लहि
विहैर सोचि सोचि धन कीना । त्योही पीछे लेहु लेहु कर भूत
रहनि कछु दीना ॥ देहरी लौं बर नारी संग है आगे संग सहेला ।
मृतक थान संग दियो खटोला फिर पुनि हंस अकेला ॥ जारे