कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरसंथी-
सेज बिछायो सुतलों पांव पसारी । आउं न जाउं मरों नहिं जीवों
साहब मेटल गारी ॥ एक नाम मैं निज के गहिह्यो तो छूटल
संसारी । एक नाम मैं बढिके लेखौ कहै कवीर पुकारी ॥ ६२ ॥
शब्द ४५१-मैं कासों कहौ को सुने को पतियाय । फुलवाके
छुवत भँवर मरिजाय ॥ टेक ॥ गगन मँडल बिच फुल यक फूला ।
तर भो डार उपर भो मूला ॥ जोतिय न बोइये सिचिय न सोह ।
बिन डार बिन पात फुल यक होह ॥ फुल भल फुलल मालिनि
भल गांथल । फुलवा विनसि गयल भँवर निरासल ॥ कह कवीर
सुनो सन्तो भाई । पंडित जन फुल रहै लुभाई ॥ ६३ ॥
शब्द ४५२-जोलहा हो बिनहु हहिमाना । जाके सुर नर सुनि
धैर ध्याना ॥ टेक ॥ ताना तने को अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु
वेदा । सर खुंटी इक राम नरायण पूरन परगटे भेदा ॥ भवसागर
यक कठवत कीन्हो तामे माडी सानी । माडीको तन माडिरह्यो
है माड़ी विरला जानी ॥ त्रिभुवन नाथ जो मंज्जन लागे स्याम
सुरार या दीना । चांद सूर दोय गोडा कीन्हो मांझ दीप किय
तीना ॥ पाई करिके भरना लीन्हों वे बान्धैको रामा । वय भरी
तिहुं लोके बांधैं कोह न रहै उबामा ॥ तीन लोक यक करिगह
कीन्हो दिग मग कीन्हो ताना । आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा
ज्योति समाना ॥ ६४ ॥
शब्द ४५३-जोगिया फिर गयो नगर मझारी । जाय समान
पांच जहाँ नारी ॥ टेक ॥ गये देशांतर कोई न बतावे । जोगिया
बहुरि गुफा नहिं आवे ॥ जरिगौ कंथ ध्वजा गौ टूटी । भजिगो
दंड खपर गौ फूटी ॥ कह कवीर यह कलि है खोटी । जो रह
करवा निकसे टोटी ॥ ६५ ॥