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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(९१६)

कबीरपंथी—

झूठे सन पूंजी सबै मिलि हारी ॥ टेक ॥ षट दरशन मिलि पंथ
चलायो तिरदेवा अधिकारी । राजा देश बडो परपंची रैयत रहत
उजारी ॥ इतते उतरहु उतते उतरहु जमकी साट सवारी । ज्यों
कपि डोर बांधि बाजीगर अपने खुशी परारी ॥ यहै पैठ उतपति
परलयको विषया सबै विकारी । जैसे स्वान अपावन राजी त्यों
लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो बात हमारी ।
अजहूं लेहुं छोडाय कालसों जो घट सुरति संभारी ॥ ६६ ॥

शब्द ४४५—न हरि भजसि न आदत छूटी । शब्दै ससुझि
सुधारत नाही अंधरे भये हियेकी फूटी ॥ टे० ॥ पानी माहि
पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका । सहस घडा नितहीं जल ढारे
फिर सूखेका सूखा ॥ सेते सेते सेत अंग भौ सैन बढो अधिकाई ।
जो सन्निपात रोगि यहि मारे सो साधुन सिधि पाई ॥ अनहद
कहत कहत जग विनसे अनहद सुधि समानी । निकट पयाना
जमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ सतगुरु मिलै बहुत सुख लहिया
सतगुरु शब्द सुधारे । कहैं कबीर सो सदा सुखारी जो यहि
पदहि विचारे ॥ ६७ ॥

शब्द ४४६—नरहर लागी दाव विकार विन ईधन मिलै न
बुझावन हारा । मैं जानों तोही ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ टे० ॥
पानी माहि अग्नि को अंकुर मिलन बुझावन पानी । एक न जरे
जरे नौ नारी जुगति न काहू जानी ॥ सहर जरे पहरू सुख सोवै
कहे कुशल घर मेरा । पुरिया जरे वस्तु निज उबै बिकल राम
रंग तेरा ॥ कुबिजा पुरुष गले यक लागी पूजि न मनकी साधा ।
करत विचार जनम गौ खीसा ई तन रहत असाधा ॥ जानि बूझ
जे कपट करत है तेहि अस मन्द न कोई । कहे कबीर सब नारि
रामकी मोते और न होई ॥ ६८ ॥