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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 914

(९००)

कवीरपंथी—

अस्नाना । आतम मारि पखानहि पूजे उनमें कछूव न ज्ञाना ॥
बहुतक देखा पीर औलिया पढे किताब कुराना । करि सुरीद
तदवीर बतावै उनमें इहै जो ज्ञाना ॥ आसन मारि हिम्भ धरि
बैठे मनमें बहुत गुमाना । पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गरब
भुलाना ॥ माला पहिने टोपी दीन्है छाप तिलक अनुमाना ।
साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ हिंदू कहै मोहि
राम पियारा तुरक कहै रहिमाना । आपसमें दोउ लरि लरि मूये
मरम न काहू जाना ॥ घर घर मंत्र जे देत फिरत हैं महिमा के
अभिमाना । गुरुवा सहित शिष्य सब बूढे अंतकाल पछिताना ॥
कहहि कवीर सुनो हो सन्तो ई सब भरम भुलाना । केतिक कहौ
कहा नहि माने सहजै सहज समाना ॥ ४ ॥

शब्द ३९३-सन्तो अचरज एक भौ भाई । कहौ तो को पति-
याई ॥ टे० ॥ एकै पुरुष एक है नारी ताकर करहु विचारा ॥
एकै अंड सकल चौरासी भरम भूल संसारा ॥ एकै नारी जाल
पसारा जगमें भयो अंदेसा । खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा
विष्णु महेशा ॥ नाग फांस लिये घट भीतर मूसि सकल जग
खाई ॥ ज्ञान खड़ग बिलु सब जग जूझै पकरि काहु ना पाई ॥
आपहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनि चुनि खाई । कहहि
कवीर जन उबरे जेहि गुरु लियो जगाई ॥ ५ ॥

शब्द ३९४-सन्तो अचरज एक भौ भारी, पुत्र धरल मह-
तारी ॥ टे० ॥ पिताके संग भई बावरी कन्या रहल कुमारी ॥
खसमहि छोड़ि ससुर संग गवनी सो किन लेहु बिचारी ॥ भाई
के संग सासुर आई सासु सौतिया दीन्हा । ननद भौज परंपंच
रच्यो है मोर नाम कहि लीन्हा ॥ समधीके संग नाहीं आई