कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
दस कोट कन्हई ॥ अनंत कोट विष्णु गये, मोरे एक पलाई ॥
सात कोट शंभू गये, सुहम्मद कोट चारी ॥ देवतनकी गिनती नहीं,
का सृष्टि बिचारी ॥ बलि बावन केते भये, कौरव दल भारी ॥
लंकापति रावन गये, रघुपति कइ वारी ॥ ना बालक ना वृद्ध हों,
ना पुरुष न नारी ॥ कहैं कवीर सुन गोरख, यह उमर हमारी ॥
शब्द ३८०—तुज बिन मेरा कोई नहीं, मैं किसे भजोरे दिवाना
॥ टे० ॥ मूल कमल चौकी गनपतकी, सुध बुध सबैं हेराना ॥
लोक लाज कुल पांचो मिलिया, हिलमिल मंगल गाना ॥ नाभ
कैमलते लहर उठत है, सुनियो संत सुजाना ॥ इंगला पिगला
सुषुमन नारी, उनमुनके घर लाना ॥ बंकनालते अमीरस झरिया,
चारखे संत सयाना ॥ चंद सूर दोग्य आसन कीन्है, अनहद घोर
निशाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तत्त भेद अब जाना ॥
जो कोई होय नामका भेदी, नामहि सो लौ लाना ॥
शब्द ३८१—मेरे मन बस गये गगन अटरिया ॥ टेक ॥ गगन
अटरिया पियाको बासा, ज्ञान पुरुष मठ धरिया ॥ जापर सुरस
नगारा बाजे, उठत शब्द धुनकरिया ॥ त्रिकुटी महलमें ध्यान
लगावे, जहां अमीरस झरिया ॥ कहैं कवीर जेहि शब्द न वेधे,
तापर हनत कटरिया ॥
शब्द ३८२—तैं व्रतधारी नामका, तोहे और न भावे । काँच
बांधके का करें, कंचन जो पावे ॥ टे० ॥ जप तप तीरथ संजमा,
कोई काम न आवे ॥ विषै पियासे ना बुझे, नल का ससुझावे ॥
स्वात बुंदके कारने, चात्रिक लौ लावे ॥ सोई बुंद मोती भये,
का सागर नावे ॥ राई ते लख नाम है, गुरुकृपा ते पावे ॥ कहैं
कवीर धावत वने, तो गरभ न आवे ॥
शब्द ३८३—देखो रे घट जंतर बाजे, कौन बजावन हारा ॥ टे० ॥