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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(८८१)

शब्द ३३२-जो कोइ निरगुन झर लख पावे ॥ टे० ॥ निर-
खत कूप कूप बिन वारी, बिन कर रहट चलावे ॥ जल बिन
शीश शीश बिन वारी, सो जल आन पियावे ॥ बिन करताल
पखावज बाजे, बिन रसना गुनगावे ॥ गावन हारके रूप न
रेखा, सो पद आन मिलावे ॥ कदलीपत्र जहर जंगलमें, बिन
गुरुके नहीं खावे ॥ उठत सनेह मरमना पावे, आगमके गोह-
रावे ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, नाहक भेख बनावे ॥ बिना
नामके भौरा घूमै, सुख सपने नहीं पावे ॥ पुरहन पत्र बसे नित
दाडुर, सोऊ सवाद न पावे ॥ कमल कलीके भौरा लोभी, सौ
जोजन उडजावे ॥ काजी हाथ किताब न आवे, मुलना बांग न
भावे ॥ वेद पुरान विप्र ना भावे, राजा राज न भावे ॥ कर
बिन कलम कलम बिन कागद, बिन मसि अंक बनावे ॥ कहें
कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु मिले लखावे ॥

शब्द ३३३-संतो समुझैका मतन्यारा, जो आतम तत्त्व
बिचारा ॥ टे० ॥ औरनसो कहें आपा खोजो, आप अपन ना
जाने ॥ मुख कछु आन हिये कछु आना, कैसे राम पहिचाने ॥
औरनसो कहें मोह न कीजे, निरमोही होय रहिये ॥ माया मोह
सकल आपहिमें, या दुख कासो कहिये ॥ औरनको कहे तजो
बडाई, आप बडाई चावे ॥ जोर बडाई छूटत नाही, झीना पीर
कहावे ॥ औरनसो कहें पछ न कीजे, आपा पछ न छूटे ॥ कहन
सुननको साधु कहावे, सांच कहे रिस छूटे ॥ जौ लग राग द्वेष
मन माहीं, अस्तुति निंदा भावे ॥ तब लग तोनों ताप ना छूटे,
कहा भये बहुगावे ॥ पद सारखी औरन समुझावे, आपा समु-
झत नाही ॥ कहें कवीर राम क्यों दूरसे, मैं तैं छूटत नाही ॥

शब्द ३३४-करोरे बंदे वा दिनकी तदबीर ॥ टे० ॥ लाल