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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८७८)

कबीरपंथी-

शब्द ३२३—अन घडिया देवा कोन करे तोरि सेवा ॥ टे० ॥
घडे देवको सब कोई पूजै, जस भीतीका लेवा ॥ जाकी सकलो
सृष्टि रची है, ताहि लहे ना भेवा ॥ को निरगुन को सरगुन
कहिये को किरतम को करता ॥ आपमें सर्व सर्वमें व्यापक,
सर्व मई होय बरता ॥ ब्रह्म विष्णु महादेव कहिये, तिनहुँको लागी
टंकिया ॥ पूरन ब्रह्म अखंडित न्यारा, सो करता अन घडिया ॥
दस औतार निरंजन कीन्हा, सो करता ना होई ॥ वे तो आपन
करनी भुगते, करता औरै कोई ॥ जोगी जती तपी सन्यासी,
आप आप मिल मुडिया ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, अलख
लखै सो तरिया ॥

शब्द ३२४—ननदी जाहुरी महलनको, अपनो बीरन जगाव ॥
॥ टे० ॥ बीरन जगाये ना जगेरी, लग न सके कछुदाव ॥
काया गठमें भई अंधियरिया, कोन करे वाके भाव ॥ भरमके
ताला लगे महलमें, कीमत कुंजी लगाव ॥ कपट किवारिया
खोलके तुम, या बिधि पियको रिझाय ॥ भक्ति घाघरा चित्त
चुनरिया, चोली चाल सियाव ॥ कर्म मसीकी काजर करले,
या बिधि पिया को रिझाय ॥ ज्ञानके दीपक कर गह लीजे,
बातीबार लगाव ॥ ततको तेल डार दीपकमें, मगन मसाल
जराव ॥ सुरतिके बिजनी करगहि लीन्हा, सेवा सेज बिछाव ॥
शीतल चँवर दार प्रीतमपर, प्रीति पिछोर उठाव ॥ बारंबार
मिले नहीं या तन, भूल कोई मत जाव ॥ कहत कमाल कबीर
के बालक, फिर ना मिले ऐसो दाव ॥

शब्द ३२५—काह भये मुखराम कहेसे ॥ टे० ॥ अंतर कपट
बचन मुख चातुर, अति अधीन होय मनन कियेसे ॥ जैसे
भुजंग ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे ॥ जैसे बधिक