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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 883

शब्दावली ।

(८६९)

मन अस्थिर ॥ विषय वासना छूटी तत्पर ॥ मोतीदास कहैं
धनधन सतगुरु उलट अभी पी पायो निजघर ॥ सत्यनाम सोई
है निज सारवा ॥

शब्द ३०३-मनुष तन पायके तुस । भजलो सिरजन हार
॥ टे० ॥ कैसे रहे अचेत कबै फिर औसर पैहो ॥ फिर न मिले
ऐसो दाव, बहुर पाछे पछतैहो ॥ लखचौरासी जियाजूनमें, मानुष
जन्म अनूप ॥ ताहि पाय चेतत नाहींरे, कहा रंक भूप ॥ गरभ
बासमें कौल किया मैं, भजिहौं तोही ॥ निशदिन सुमरों नाम,
कष्टते काढो मोही ॥ एकनामको जानके, रहों नाम लौलाय ।
नेक न तोहि विसारिहौं, या तन रहे की जाय ॥ इतना किया
करार काढ प्रभु, बाहर कीन्हा ॥ भूल गये वह बात भये माया
आधीना ॥ भूली बतियाँ वा दिनकी, आय गई मत आन ॥
बाराबरस तो ऐसे बीते, खेलेत फिरत नदान ॥ तरुनापन जब
लगा, देह जोवन मदमाता ॥ चलत निनारे छाँह, तमकके बोले
बाता ॥ चोवा चंदन लायके, पहिरे बसन बनाय ॥ गलियारे
झाँखत फिरे, परत्रिया देख मुसकाय ॥ तरुनापन गये बीत,
बुढापा आय तुलानो ॥ कंपन लागे शीश, चलत दौय चरन
पिरानो ॥ नैन नासिका चूवन लगै, मुखसे न आवै स्वास ॥
वात कफने घेर लिया है, छूट गया तन आश ॥ माता पिता
सुत नार, कहो काके संगलागी । तन मन धन बरजत नहीं,
कामिन होत सुभागी ॥ एकदिन काल गरासई, परिहो जमके
दाव ॥ बिन सतगुरु ना बाँचहूँ, कोटन करो उपाय ॥ सुफल
भई या देह, नेह साहेबसो कीजै ॥ सतगुरु दाता आहि, मुक्तपद
उनसे लीजे ॥ सुफल भई मनकामना, सुमरन लागे पीर ॥ यह
लीला है मुक्तिकी, गावे साहेब कवीर ॥