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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८६६)

कवीरपंथी-

शिला द्वार दे राखा । उत्तर दिशा सजीव न चारखा ॥ चार
दिशाको हाल ॥ दिनके सोध रैनमें लावे । रैनके भीतर भानु
जगावै ॥ भानुके भीतर शशिखा बासा । शशिके भीतर दिवस
प्रकाशा ॥ ताबिच सार न तार ॥ नौको सोध सिलसिला लावे ॥
एक बार सुमेर डुलावे ॥ मेरु दंडपर आसन लावे । मन मुख
धागा सुरति गहावे ॥ गगन गुफाके हाल ॥ गगन गुफामें अति
उजियाला । अजपा जाप जपे तहां माला ॥ वीना शंख सहनाई
बाजे ॥ चहुँदिश राय निरंजन गाजे ॥ हीरा जनम मोहाल ॥
कहैं कवीर कोइ बिरला पावे । जाको सतगुरु अलख लखावे ॥
क्षमा शील संतोष समाई । दया गरीबी आवे भाई ॥ सो चले
हमारे नाल ॥

शब्द २९७-शब्द जहाज चढो रे मन भाई ॥ टेक ॥ कर करता
से कौल गरभमें लिया बसेरा ॥ माताको दुख दिया मास नौ
रहा अकेला । शिर नीचे पग ऊपर ॥ करतासे करे पुकार ॥
त्रिगुन फंद निरवारो स्वामी । अब ना आऊं यह देश गोसाई ॥
बालापनमें भूल नाम, हिरदे ना लीन्ह ॥ तरुनापन जब लगा,
मोह त्रियासे कीन्ह ॥ आये बुढापा बावरा मुखसे कहे न नाम ॥
तीनों पन ऐसेमें खोई, नर देही बेबाद गवाई ॥ भगति करै कछु
आपतरे, औरनको तारे इतनी मनकी दौर ॥ दर्शन मिले न
साधको, निशदिन रहे उदास ॥ ले बैठारो अजर अमर घर,
बहुर न आऊं यह देश गोसाई ॥ धर्मदासकी बीनती, सुनियो
सत्त कवीर ॥ एक बार एको ना रहिहै, फिर करता कछु और
उपाई ॥

शब्द २९८-चेत सबेरा चलना बाट । यह जग देखा झूठा
ठाट ॥ टे० ॥ चलनेकी तजबीज न कीन्ह ॥ मजलोंकी खर्ची ना