कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
शीलके बखतर पहिरे, जुगतके लांग चढाई ॥ नाम टोष माथेपे
धरके, जौ भर अनी न आई ॥ पहरेदार सिपाही सांचे, वो नहिं
सोवे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, छिनपल देत जगाई ॥ ❁
शब्द २३३—सतगुरु निरबानी निरबानी, जाके सुक्ति भरत है
पानी ॥ टे० ॥ अष्ट सिद्ध नौ निध करत मजूरी, और विधाता
रानी ॥ चंद सूर दोउ बरे मसाले, सुरत गगन ठहरानी ॥ अर्थ
धर्म और काम मोक्ष फल, बैल फिरे ज्यों घानी ॥ तहवाँ है एक
अगोचर, निगम नेति ना जानी ॥ चार वेद नौ व्याकरण कहिये,
अष्टादशो पुरानी ॥ सत्य भगति विन चार पदार्थ, काग विष्ट
सम जानी ॥ अवरन वरन रूप सब वाको, गरज गगन चहरानी ॥
कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अजरा अमर निशानी ॥
शब्द २३४—सतगुरु अबिनाशी अबिनाशी, जाके सुक्ति रहत
है दासी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा जाको पार न पावे, निरंजन करे खवासी ॥
सेष सहस्र सुख निशि दिन गावें, सो भी पार न पासी ॥ शंकर
जाको ध्यान धरत हैं, कहिये जोग उपासी ॥ चार वेद जाके भेद
न जाने, खोज खोज मरजासी ॥ ओंकारमें भरमत डोले, विष्णु
फिरे उदासी ॥ नाम पदार्थ हाथ न आवे, परे कालकी फांसी ॥
अजर अमर वे परम पुरुष हैं, कहिये फूल सुबासी ॥ कहैं कवीर
सुनो भाइ साधो, अमरलोकके बासी ॥
शब्द २३५—सतगुरु आदि संदेसी आये ॥ सोरा असंख जुग
वीत गयो है, भेद न काहू पाये ॥ टे० ॥ दुनियाँ रही खुलाय रूबाबमें,
सोवत नींद जगाये ॥ दया भाव औं नाम पान ले हंसन पार
लगाये ॥ काशीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नाम कवीर कहाये ॥
कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीवन फंद बुढाये ॥ ❁