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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

(८०)

कबीरपंथी—

उह डोलत संग पिछार सखे, ढिल अंग लखी गठरी गहि भाजी ।
डुशियार हो संत सुजान सुनो, पलही भरमें वह मारत बाजी ॥
गठि कण्ठ लिये फँसरी करमें, सिद्ध साधुनके गल डारत पाजी ।
सत धर्म नशाय खँसाय लियो, तब नेक डुबावनको सज साजी १२

जबलों तन प्यार न प्यार पिया, तन आस तजे पिय खास
सही है । नहिं मैं तब तू जब मैं नहिं तू, रह एक विवेककी टेक
सही है ॥ जहाँ राम न दूसर काम तहाँ, रवि रैन यकत्र न होत
कही है । जब प्रीति गही तहिये गहिरी, कुल कानि कहाँ सुलतान
वही है ॥ १३ ॥

जिमि चुम्बक लोहसे मोह करे, जलहीन भई जस मीन दुखारी ।
अलि अम्बुज प्रीति न बीति कभी, पपिहा लपिहा सुख स्वातिकी
बारी । जिमि चन्द चकोर यकोर लखे, सिख दीपक रंग पतंग
निहारी । यहि राह न नाहसे नेह लगी, नहिं आशिक है वह
फाँसिक यारी ॥ १४ ॥

दगपूरति नींद हराम भई, धनि लेत उसासहि बारहिं बारा ।
तन पीत भयो कृश गात भयो तस बात भयो लघु भोजन धारा ॥
अधरा पट सूख तृषा हियमें, नहिं जो पिय रूप पियूष निहारा ॥
गुन गान सदा हिय ध्यान धरे, बिरहिनके यह दश चिह्न उचारा १५

पथ देव अकाश नहीं जन है, असमान लियो निज पाग
उतारी । पसराय दियो सगरे दुगरे, गुरु खाट निहारत पांव दे
डारी ॥ बिखराय सबै मणि माणिकको, विरती बलि बैठि यती
व्रत धारी । दिन भूषण ध्यान धरे सुनिहा, दुख दूखन पूषन
पेखन टारी ॥ १६ ॥

कहुँ चोर चकोर रु चन्द बधू, विगसात अनन्द उलूक लही
है । कहुँ बादुर बीर बहादुर भय, दुख दायक जंतु अनंत मही