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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७९)

कछु तेही ॥ तम त्रासक ध्यान धरो उधरो, सुधरे सुधि बुद्धि
दया दग जेही । गुरु देव बिना निशि नाश नहीं, विश्वास करो
एक युक्ति है एही ॥ ६ ॥

यह नींद सही है महा ठगनी, छनमें धन जोवन वृन्द बुहारी ।
गहि गोड जती नहि छोड मती, छलि साधुकी सम्पति लूटन हारी ।
सजि कण्ठको वेष न देखि परे, इमि आई है ओढ़िके कामरि कारी ।
यह है न नहीं कमरी पसरी, गठरी धनकी बांधि सँवारी ॥ ७ ॥

हरि नाम चरित्र पवित्र महा, सुत्तामणिके वन देत दवारी । घन
घोर घरे नहि सूरि परै, धरि वज्र कपाट सुज्ञानकी द्वारी ॥ रिधि
सिद्धि जहां लगि लाभ कहै, इन सर्व गहे ठगनी छल कारी । नहि
कूछ रहा इन छूछ कियो, यहि कान भये ऋषिराज भिखारी ॥ ८ ॥

मनते भुख भ्रूख अहार गहे, व अहार ते नींद सो कालकी
फांसी । यम दण्ड प्रचण्ड यही है यही, करसो सतखण्ड सो
ज्ञान की रासी ॥ नहि शुद्ध स्वरूप लखे हरिके, धरि अन्ध कियो
धर्मरायकी दासी । यदि जाल फँसायके काल हते, सब जीव बने
भवसागर वासी ॥ ९ ॥

नहिं चेत रहा दुख देत महा, हरि हेत कहा दुर्बुद्धि बड़ी है ।
पिय आगु खड़े नहिं चीन्हि पड़े, दग सन्मुख कन्धकी सन्ध
पडी है ॥ तजि राम हरामके काम लगे, चुहडी फुहडी जब आन
अडी है । सुमती हरिगै कुमती भरिगै, यम सेल हिये बिच
ठेलि गडी है ॥ १० ॥

मन रौन जो भौनते गौन कियो, तमसी तमसी तमसी तम ठोने ।
अति प्राण अधार अधार बिना, विलपात अधीर धराधर कोने ॥
यहि बैरिन पैरिन संग लिये, पहुँची विरहा विष बेलको पोने । सुख
साच बिहाय अकाज भयो, नियरानि सुभाग सुभागि निधोने ॥ ११ ॥