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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८४३)

तिहुपुर फिरी दोहाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मारत
ढोल बजाई ॥

शब्द २१३-भजन कब करिहौ जनम सिरान ॥ टे० ॥ गरभ
बासमें भगति कबूले, बाहर आयके गये खुलान ॥ बालापनमें
खोय गँवाये, तरुनामें अभिमान गुमान ॥ वृद्ध भये तन थाकन लागे,
शिर धुनि धुनि मनुवाँ पछतान ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो,
जमके हाथमें गये विकान ॥

शब्द २१४-भजन दिन रे बीता जात ॥ टेक ॥ करले भजन
भलो तन पायो, भजन बिना सुख पाया किन रे ॥ उपजत बिनसत
जुग चारों गये, बेद विचारत गये गन सुनि रे ॥ पलमाँही परले
हो जैहै, बिनसत लगे घरी ना छिन रे ॥ कहे कवीर भजन कर
वाके, पानीसे पिंड सँवारा जिन रे ॥

शब्द २१५-भजन कर निशि दिन टूटे न तार ॥ टेक ॥ एक
ब्रह्मका सकल पसारा, घरि घरि पल पल लिजे संभार ॥ या मन
मिलिया साधन सो रे, सोहैं शब्दकी लगी लगार ॥ निश दिन
भजन करो सतगुरुके, काया मधे है ततसार ॥ कहे कवीर सुनो
भाई साधो, बिन सतगुरु ना होय उबार ॥

शब्द २१६-भजन कर जगमें जीवन सार ॥ टेक ॥ नर देहीको
गरब न करिये, जर-बर होय छिनमें छार ॥ पाँचों मार पचीसों
बस कर, जमराजाकी चोट संभार ॥ नदिया गहरी नाव पुरानी,
बिन सतगुरु कैसे उतरे पार ॥ कहैं कवीर सतगुरुके भजन कर,
भौसागरसे उतरो पार ॥

शब्द २१७-भजनको भाईरे ऐसो तन पायके ॥ टे० ॥ नाहिं रहै
लंकापति रावन, नाहिं रहै दुर्योधन राई रे ॥ मात पिता सुत
भाई बंद ठाढे, आइ जमराज पकर ले जाई रे ॥ लाल खंभ पर