कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 841, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(८२७)
तब का चेतो अंध । एक नाम जाने बिना, परो कालके फंद ॥
ऊंट सलीता बहुत बहुत, हाथी ओ घोडा । चलत वारके समय,
न लागे एको डोरा ॥ कंचन महला घर रही, और सुंदरी नार ।
जो आये सो जात हैं, चले दोऊ कर झार ॥ ऐसा यह संसार
जान, जस रहटके घरिया । एक आवे एक जाय, एक पुन आवे
भरिया ॥ उपज उपज बिनसत फिरे, फिर फिर करे गरास । एही
तमाशा देखके, चितमें भये उदास । खेत बिराने लागे मृगा,
एक बनसे गाधा । नित प्रति चर चर जाय, एक दिन आया व्याधा ॥
छूटन चाहे बल करे, मनही मन पछताय । अब कैसेके छूटनो,
जब धनी पहुँचा आय ॥ ऐसा यह संसार जान, जस गुडकी मंखी ।
लागी चाखन बैठ, बाझगये दोनों पंखी ॥ पंख मरोरें शिर धुने,
मनही मन पछताय । वह मलयगर छोड़के, यह दुख पायेउ आय ॥
काह कहुँ कित जाउं, आन चहुँ दिशसे घेरा । मात पिता पुचकार,
हाथ चोटीसे फेरा ॥ मोह फांसमें बांधके, छूट न पावे जान ।
नारी तो बैरी भई, पुत्र भये निगमान ॥ यहाँ दूधका दूध, और
पानीका पानी । सुनो संतो चितलाय, कहुँ यह अकथ कहानी ॥
कँवल कली बिगसित भई, अनभौ शब्द उचार । यह लीला है
मुक्तिका, कहें कवीर बिचार ॥ ❁
शब्द १७२-हीरा तन पाय तूने सुमति गँवाई ॥ टे० ॥ नौ दस
मास गरभमें राखे, नरक योनि भुगताई ॥ नरक योनिसे बाहिर
काटे, मात पिताकी सुध बिसराई ॥ बालापनमें खेल गँवाये,
पीछे ज्वानी आई ॥ जो माताने दूध पिलाई, सो माताको लात
चलाई ॥ बृद्ध भये कफ आवन लागे, द्वारे खाट बिछाई ॥ पार-
परोसी सब जुर आये, घरके कहैं यहि मौत न आई ॥ भवसा-