कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
अविगत प्याली॥ नौका बैठे रहट चलावे, सौंचत काया बारी॥
कहे कवीर सुनो भाई साधो, सतगुरुकी बलिहारी ॥
शब्द १७०—लग्गी न छूटे चाहे जिय जाय॥टे०॥ सारके भाले
सार रहे, गुरु ज्ञान कमान चढाई॥ सतगुरु केवल वहियां, कोई
अंदर भाल रमाई ॥ ध्रुव लागी प्रहलादे लागी, लागी विभीषन
राई ॥ बिप्र सुदामाको ऐसी लागी, कंचन पुरी बसाई ॥ गोरख
गोपीचंद भरथरी लागी, मीरा बाई ॥ पीपाजूको ऐसी लागी।
कूद परा दह मांही॥ रंका लागी बंका लागी, लागी सदन कसाई॥
साह बलखको ऐसी लागी छाड़ चला बदसाई ॥ शेख फरीद
कुवा बिच लटके, कागा चुन चुन खाई॥ वाजिंदाको ऐसी लागी;
दौलत सबै लुटाई ॥ पैडेमें एक घायल पडा, वाके घाव नजर
नहि आई ॥ पाव पलककी खबर न जाने, गहरी नीव दिवाई ॥
भौसागरमें नाव परी है, पार लगावो साई ॥ कहे कवीर दया
सतगुरु बिन, कायर बूडा जाई ॥
शब्द १७१—हीरा जनम न बारम्बार, समुझ मन चेत करो॥टे०॥
पूरन परमानंद किया सब ताका होई। जब तब राखनहार, तरन
तारन है सोई॥ संग आवै संग जायगे, अजहू संग रहाय। संग
तुमारा छोड़के, अंत न कतहुं जाय॥ ठहर अगिनकी आंख तहां,
प्रभु सिरजे अंगा। तहवां रच्छा करी आप, तुम्हारे होय संग॥
एक बुंदके साजमें, ऐसा किया बनाव। सरवन नैन मुख नाशिका,
छबि दिये चलनको पांव ॥ कीट पतंग पखान भये, तरवर पशु
पंछी। जलतरंग शिव भये, भये मगरा औ मछी ॥ अंग उघारे
ते फिर, कतहुं न पावे सुकर। एक नाम जाने बिना, जनम जनम
बहु दुकर ॥ बूडे दुख बिहाल जबे, औंचे सुख झूले। सो दिन
बेग सँभार, कहैवा जाते अब भूले॥ मन भ्रमताके कारने, कीन्है