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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८१४)

कवीरपंथी-

आदि ईंद्र सब भागे, सुध बुध सत बिसरी ॥ ये सबहीके देखा-
देखी, दुनिया भगी बपुरी ॥ धीरज राख रहे ना कोई, छांड भगे
नगरी ॥ कहैं कवीर हटको नहीं माने, धौखेकी बिडरी ॥

शब्द १३६-संतो काल रची जग बाजी ॥ वेद पठे पठ पंडित
भूले, पठ कुरान भूले काजी ॥ टे० ॥ आप न बूझे जगत बुझावे,
शब्द वेद अरथावे । अमृत विषहिं एक कर माने, भेद न कोई
पावे ॥ आप कहे जग काल अपरबल, आपहि धारे ध्याना ।
जिन जिव दियो सोई जिव लेवै, सबका एही ज्ञाना ॥ वेद पठे
औ अरथ विचारे, सूझ बूझ न पावे । जरा मरनके आस बंधै सब,
फिर फिर जोनी आवे ॥ जोगी तपसी बुनिवर कहिये, संत साध
सब धावे । आवत जात जन्म बहु बीते, अस्थिर घर ना पावे ॥
पीर औलिया गোস कुतबिया, फिर फिर यही पुजावे । मेहनत करे
सोई फल भुगते, पाक साहब ना पावे ॥ उतपति परले पैठ लगाई,
सकल जीव भरमावे । भँवरजाल कियो भौसागर, पार न कोई
पावे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु चीन्हैं, सो यहि भेदका पावे ।
आवागमन दोऊ दुख मेटै, निहचल घरहिं पठावे ॥

शब्द १३७-माया काली नागनि जिन डसिया सब संसार ॥
टे० ॥ इंद्र डसे ब्रह्मा डसे, नारद डसिया व्यास । बात कहत
शिवको डसी, जाके छिन एक बैठी पास ॥ कंस डसे सिसपाल
डसे, रावन डसिया जाय । दस मस्तक जाके भूमि परे, ताकर
लंका दर्ई लुटाय ॥ बड़ बड़ गारुड सब डसे, कोइ न कीलनहार ।
कच्छ देश गोरख डसे, जाका जोग अपार ॥ चुन चुन मारे चतुर
सूरमा, जाकी करे जग आर । तोसे गरीबकी कौन गिने, कहैं
कवीर विचार ॥

शब्द १३८-रामगति पार न पावे कोई ॥ चितामन प्रभु निकट