कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
शब्द १२९—कहे सुने कछु नहीं संतो, कहे सुने कछु नहीं ॥
जब लग जीव जंजाल न छूटै, विषै विकल तन माहीं ॥ टे० ॥
करत अनीत मगन मायामें, कहें अगमकी बानी । सो प्रतीत जो
साध न मानी, मुष्ट माहली जानी ॥ सीखे साख ब्रह्म होय बैठे,
निरभै बिषै कमावे । पूछते परपंची गानी, साख अगमकी लावे ॥
षद् सारखी सिध साधिक दीसे, ईन्द्रिन हैं अपराधी । जो घट नाम
नहीं निज निर्मल, देह दशा को साधी ॥ जो कछु किये ज्ञान
अज्ञाना, सोई समझ सयाना । कहें कवीर तिनसो का कहिये,
देखत दृष्टि भुलाना ॥
शब्द १३०—संतो कथनी कहे ते खोटा ॥ जो लग कर्म बिकार
न खोवै, कोयला कपट जिय औटा ॥ टे० ॥ ज्ञान ग्रंथ कब
चातुर कीन्ही, बांधे विषके मोटा । तज अनरीती औ कुलके लालच,
जगमें बडे घर लूटा ॥ सांचे शब्दकी चाल न आवै, हिरदै नहीं
है हेता ॥ ऐसी भक्ति सुक्ति ना पावो, साहब है नहिं काचा ॥
कहें कवीर अंतरकी करनी, निकसे जिभ्या मुख वाटा ॥ सार
शब्दकी परख न आवे, झूठा लागे मीठा ॥
शब्द १३१—मनको चीन्होरे नर भाई ॥ आतम मार पखानहि
पूजे, बहो सकल जग जाई ॥ टे० ॥ आगे आगे पंडित पाछे सब
दुनियां, अचरज कही न जाई ॥ सबे गये मोहि यही अंदेशा,
बहुर खबर नहिं पाई ॥ एक दोय होय तो कहि समझाऊं, जगसों
कहा न जाई ॥ वैद्य अनेक स्वान जो लागे, पूछ न मिटै टेढाई ॥
सांच कहों तो सब जग खीजै, झूठा कहा न जाई ॥ समझ कवीर
रहो घट भीतर, को पच मरे बलाई ॥
शब्द १३२—भरममें भूल रह्यो संसार । बीज बस्तु कैसे के पावे,
जाका सकल पसार ॥ टे० ॥ क्रीतम नाम जान बहु थापे, करता