कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
चुगना ॥ बिना नैन जहाँ देखन पेशा, तहाँ मृतक होय रहना ॥
चंद न सूर दिवस ना रजनी, तहाँ जाय सुरति मिलाई ॥ विन
जिभ्या जहाँ अमृत अचवे, बिन जल तृषा बुझाई ॥ जहाँ कुछ
नहीं तहाँ सब कुछ देखा, या सुख कासों कहना ॥ कहैं कवीर
बल बल सतगुरुकी, धन्य शिष्यका लहना ॥
शब्द ७६—ऐसा कोई प्रेमका देखा मतवाला हो ॥ टे० ॥ छाक
चढी क्षुधा बीसरी, पिया प्रेम पियाला ॥ पीवत तेहि तन बीसरी,
सो जगतसे न्यारा ॥ कान सुना देखा नहीं, वाते मतवाला ॥
सो छाका निज नामसे, सतगुरुका प्याला ॥ गोली लागी ज्ञानकी,
कसनी बहुते दीन्हा ॥ जीवतही मृतक होय रहे, जिन गुरुगम
चीन्हा ॥ नामरसायन जो पिये, जग बहुर न आवे ॥ कहैं कवीर
कोई छका, जेहि कछु और न भावे ॥
शब्द ७७—एक दिन होयगा प्रान बिगाना ॥ टे० ॥ जो लग प्रान
बोले घट भीतर, तों लग करत गुमाना ॥ निकसे प्रान बाहिर कर
डेरा, घरके लोग डराना । काठके ठठरीमें लेके चढावे, लै जमुना
पहुँठामा ॥ पांच जने मिल फूँक दिये हैं, जर गये सुखके ग्रामा ।
कहे कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरवाना ॥ पद निरवान
चीन्ह ना पावे, अंतकाल पछताना ॥
शब्द ७८—निस दिन माला जुगतकी फेरे ॥ टे० ॥ रवि शशि
बांध मन धागा करे, गहि गहि तार सोहंगम घेरे ॥ बंक नाल
चढ़ि गिरवर तरवरे, जब टकसार गगन गढ पैरे ॥ अर्ध उर्ध बिच
अजब रंग कहिये, बरषे शब्द अमीरस झरे ॥ कहैं कवीर सुनो
भाई साधू, ऐसा ध्यान कोई बिरले धरे ॥
शब्द ७९—हंसनके नाह तुम तबहीं कहाये हो ॥ टे० ॥ काशीमें
केवल नाम माड़ौ है, उडीसा धाम पंडो पग जरत, देखत वहीँ