सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

(७४)

कवीरपंथी-

अंतरजामि सु संकटसे बहु जीव दुखावे ॥ १ ॥ लोभ महामद
क्रोध उपावत होत अधीर बहु चित मेरो ॥ मोह महा ममता
रजनीवत बारम्बार रहे नित घेरो ॥ एक उपाय अहै बचवे अब
होहु दयाल दयाकरि हेरो ॥ काह कहूँ कछु आप छिप्यो कहँ हो
प्रभु नाथ अनाथन केरो ॥ मो कह तात तुही पितु मात सु और
उपाय नहीं कछु मोही ॥ जो सुत मातुपिता ढिग आवत तो वह
मातु सो दृष्टि न जोई ॥ तो पुनि लोटतपोटत अंगनलेत उठाय
दयाकरि वोही ॥ त्यों गुरुदेव कवीर कृपाल सु है एक आश
शरणगति तोही ॥३॥ दासको संकट देखि दयानिधि है करूणाकर
आतुर धायो ॥ इन्द्रमती जब टेरे कियो प्रभु जाय तहाँ वह
पीर मिटायो ॥ बांधत सेतु सहाय कियो प्रभु रामहु केर उपाय
बनायो ॥ कौन सो संकट मोहि गरीबको जो तुमसे नहिं जात
छुड़ायो ॥४॥ जाय पुरी पुरुषोत्तमके प्रभु देकर दंड समुद्र हटायो ॥
विप्रनके अभिमान महाप्रभु तोरनको बहु रूप दिखायो ॥
वे भये दीन परे चरणों तब चारिहुँ जाति सो एक मिलायो ॥
दास जहाँ जहाँ जो कछु टेरत ताकर होहु तुम बेगि सहायो ॥५॥
मो कह काहे बिसारत साम्प्रथ दीनदयाल कवीर उदारा ॥
आनंदरूप अजीत गोसाईं सु मोहमया सबसे प्रभु पारा ॥ साक्षिस्वरूप
अनूपम शोभित पारस्वरूप अकार तुम्हारा ॥ हैं अति दीन
अधीन दुखी बहु मेटहु मोर अघोर अँधारा ॥६॥ यह बर माँगहु
देहु दयाकरि अंतरजामि सुज्ञान प्रकासा ॥ बोध स्वरूप सदा
निर्णय गुरु सो मनमें तुम होहु उजासा ॥ वेद पुराण कुराण
जो गावहिं पार न पावहिं होहिं उदासा ॥ जापर मौज करो तुम
साहेब सो पुनि हंस मिले तुम पास ॥७॥ ये गुरु अष्टक पाठ करे
नर आप सुने अरु ध्यान धरेंगे ॥ है सरधा अति प्रेमहुं पावत
मार्ग चाल सुचाल चलेंगे ॥ ते नर पावहिं मुक्ति पदारथ