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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(७८०)

कवीरपंथी—

अजहू बालकुवारी॥ ससुर हमारा बाला भोला, सासू बालकुवारी॥
साई हमारा पालन झूलेँ, हमहिं झुलावन हारी॥ ना जाऊँ ससुरार
न नैहर रहुँ मैं, कोउ पुरुष संग नाहिं नसाऊँ॥ कहैं कवीर सुनो
भाइ साधू, नहीं अंगसे अंग मिलाऊँ॥

शब्द २७—हंसा छोड करमकी आसा । कर्मकाल सब जगत
नचावै, फिर फिर करे गरासा ॥ टे० ॥ उपजन विनसन कर्महिं
कहिये, कर्महिं जगत बिनासा ॥ कर्महिं काल ब्याल पुनि कर्महिं,
कर्महिंका सब त्रासा ॥ जप तप कर्म बांधि जग राखे, पाप पुन्य
विस्वासा ॥ कर्महिं देवल तीरथ कहिये, कर्महिं अलह उदासा ॥
कर्महिं जोग ध्यान तप पूजा, कर्म चढावे दासा ॥ कर्महिं दुख सुख
जड़ चेतन है, तीन लोक परकासा ॥ कर्महिं देय लेय पुनि कर्महिं,
यज्ञ दान रहिवासा ॥ प्रतिमा भूत कर्मके बस है, सुविचार अचार
निवासा ॥ कर्म दुखी दालिद्वी कहिये, कर्महिं भोग विलासा ॥
कर्म बिकार राह तज बैठो, कहैं कबीर सुख बासा ॥

शब्द २८—हंसा त्रिगुन कर्मकी मोट । राजस तामस और
सतोषुन, बिषम कालके चोट ॥ टे० ॥ द्वादस बान बंध्यो तीनोको,
कोई बडे कोइ छोट । चित बुध अंह मोह मद माया, मार चराचर
चोट ॥ राग द्वेष भौ बान कामके, अहि रैन दिन कोट । जरा
मरन माहुर बंधायो, मरे विषनके चोट ॥ एकै दिष्टि बान सर ताने,
चक्रदेव गन कोट ॥ जप तप कोट साधना पूजा, चढे मांस मद
रोट ॥ नाना अमल मात जिव माते, ज्ञानहीन तन खोट । कहैं
कबीर विन सतगुरु सेवा, करमन बांधल पोट ॥

शब्द २९—हंसा कर ले शब्द वसेरा ॥ रोम रोम जमदूतन घेरो,
ज्यों कांटे टिग केरा ॥ टे० ॥ अहिनिंस बसो शब्दके मांही, गुरुमुख
शब्द निवेरा ॥ गुरुके वचन शिष्य जो माने, शब्द सुरति सो हेरा ॥