कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
प्र० मिटाइये क्या ? उ० प्रम ।
भरम मिटा तब जानिये, अचरज लगे न कोय ।
यह लीला सब रामकी, निरखे आपा खोय ॥ १६ ॥
प्र० निरखिये क्या ? उ० निजरूप ।
निरखत अपने रूपको, थीर होय सब अंग ।
कहन सुनन कछु ना रहे, ज्योंका त्योंहि अभंग ॥ १७ ॥
प्र० सुनिये क्या ? उ० गुणवार्ता ।
सुनिये गुणकी वार्ता, औगुन गुनिये नाहिं ।
हंस छीरको गहत है, नीरस त्यागत आहि ॥ १८ ॥
प्र० साधिये क्या ? उ० इन्द्री ।
साधे इन्द्री प्रबलको, जिहिं ते उठे उपाध ।
मन राजा बहकावते, पाँचो बडे असाध ॥ १९ ॥
प्र० भारिये क्या ? आशा ।
मारिये आशा साँपनि, जिन डसिया संसार ।
ताकी औषध तोष है, यह गुरु मंत्र विचार ॥ २० ॥
प्र० दोने क्या ? उ० दान ।
भूखेको कछु दीजिये, यथा शक्ति जो होय ।
ता ऊपर शीतल बचन, लखी आत्मा सोय ॥ २१ ॥
प्र० बड़ा पुण्य क्या ? उ० दया ।
दया पुण्य सबसे बड़ा, सबके ऊपर भाख ।
जीव दया चित्त राखिये, वेद पुराण है साख ॥ २२ ॥
प्र० बड़ा पाप क्या उ० हिंसा ।
बड़ा पाप हिंसा अहै, ता समान नहिं कोय ।
लेखा मांगे धर्म जब, तब सब नौबत होय ॥ २३ ॥
प्र० खुशबूई क्या ? उ० यश ।
खुशबूई यशकी भली फैल रही चहुँ ओर ।
मल्या गिरि सम गंध है, प्रगट बसे जग सोर ॥ २४ ॥