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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(७६६)

कबीरपंथी—

धारो ॥ आदिगुरु तब देखि दया करि, तीसा यंत्र शब्द उचारो ।
चारहु वेद पुरान अठारह, सोधि कहो यह तत् विचारो ॥

सा०-जीव किरतारथ कारने, भाषा कीन विचार ।
तीसा जंतर बूझिके, नर उतरे भव पार ॥
कलिमें जीवन अलप है, करिये बेगि सम्हार ।
तप साधन नहि हो सके, केवल नाम अधार ॥

प्र० जगाइये क्या ? उ० प्रेम.

प्रेम जगावे विरहको, विरह जगावे पीव ।
पीव जगावे जीवको, वही पीव वहि जीव ॥ १ ॥

प्र० कीजिये क्या ? उ० पूजा ।

पूजा गुरुकी कीजिये, सब पूजा जेहि माहिं ।
ज्यों जल सींचे मूलको, फूले फले अघाहिं ॥ २ ॥

प्र० परखिये क्या ? उ० शब्द ।

परखो द्वारा शब्दका, जो गुरु कहे विचार ।
विना शब्द कछु ना मिले, देखो नैन निहार ॥ ३ ॥

प्र० लीजिये क्या ? उ० नाम ।

नाम मिलावे रूपको, जो जन खोजी होय ।
जब वह रूप हिरदे बसे, क्षुधा रहे ना कोय ॥ ४ ॥

प्र० करिये क्या ? उ० सत्संग ।

करिये नित सत्संगको, बाधा सकल मिटाय ।
ऐसा अवसर ना मिलै, डुरलभ नर तन पाय ॥ ५ ॥

प्र० बोलिये क्या ? उ० मीठा ।

मीठा सबसे बोलिये, रस उपजे चहुँ ओर ।
बसी करन यह मंत्र है, तेजो बचन कठोर ॥ ६ ॥

पछापछी कारने, सब जग गया मूलान ।

निरपछ होयके हरि भजे, सोई संत मुजान ॥

बिनको अपना कल्याण करना है उन्हें सदा ऐसी साम्प्रदायिकता और मिथ्या अभिमानसे अलग रहकर
सत्यकेही बोझ और ग्रहणमें रहना चाहिये ।

संप्रहकर्ता—श्रीयुगलानन्द बिहारी,