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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

भांडा, एकहि सिरजन हारा ॥ जैसे बढई काठहिं काटै, अगिन
न काटै कोई । ऐसे व्यापक है सबहिनमें, रवि स्वरूप है सोई ॥
माया मोह करि जगत भुलाना, गरंथ देखि गरवाना ॥ होय
निःशंक शंक नहिं व्यापै, कहैं कवीर दिवाना ॥

राग कान्हडा १९—अब मैं पायो ब्रह्म ग्यान । सहज समाधी
मुखमें रहिबो, कोटि कलप विसरान ॥ टे० ॥ गुरु कृपाल कृपा
जब कीन्हा, हृदया कमल बिगासा ॥ भागा भरम दसों दिसि
सूझा, परम ज्योति परगासा ॥ मृतक उठी धनुष कर लीन्हा,
काल अहेरी भागा ॥ उदसिया सूर निसि किया प्याना, सोवतते
तब जागा ॥ अविगत अकल अनुपम देखा, कहता कहो न जाई ॥
सेन करै मनही मन राखे, गुंगे जान मिठाई ॥ पुहुप बिना एक
तरुवर फलिया, बिन कर तूर बजाया ॥ नारी विना नीर घट
भरिया, सहज रूपसो पाया ॥ देखत काँच भया मन कंचन,
बिन बानी मन माना ॥ उडा विहंगम खोज न पाया, ज्यों जल
जलहि समाना ॥ पूजो देव बहुरि नहिं पूजूं, नहाय उदक न
नहाऊं ॥ भाग्या भरम एकहि कहता, आप बहुरि नहिं आऊं ॥
आपामें जब आप निरखिया, आपनमें आपहिं सूझा ॥ आपहिं
कहत सुनत पुनि आपै, आपनमहिं आपा बूझा ॥ अपने परिचय
लागी तारी, आपनमें आप समाना ॥ कहैं कवीर जे आप
विचारे, मिटिगा आवन जाना ॥

राग कान्हडा २०—कौन मरे जन्मे को आई । सुरग नरक कौन
गति पाई ॥ टेक ॥ पांच तत्त्व अविगत तैं उपजा, ये कै किया
निवासा ॥ विछुरा तत्त्व फिर ततैं समाना, रेषहिं रही न आसा ॥
जलमें कुंभ कुंभमें जल है, बाहर भीतर पानी ॥ बिनसा कुंभ
जल जलहि समाना, यह तत कथै सु ग्यानी ॥ आदे गगना मधे