सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 764

(७५०)

कवीरपंथी-

राग कान्हड़ा ५-चल मन हरि चटसाल पढाऊँ । जात कुमार
मारग लाऊँ ॥ टे० ॥ पाटी प्रीति सुरतिकी लेखन, रराँ मम्मा
दोय अंक लिखाऊँ ॥ गुरुकी साटि शब्दकी औपटि, बिच बिच
सहज समाधि लगाऊँ ॥ बावन भित्र रहत जोइ अच्छर, सो पद
परसि बहुरि नहिँ आऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हेलो
मारि कहि समझाऊँ ॥

राग कान्हड़ा ६-नाम मोर पूंजी नाम मोर धना । या पूंजीसे
लगो मेरो मना ॥ टेक ॥ या पूंजी है अगम अपारा । कोई इक
बनिजे साहूकारा ॥ अगिन जरे न ईली खाय । राजा डंडे न चोर
लेजाय ॥ खेती करै न बनिजन जाय । नाम खजीना वैठा खाय ॥
कागद चढै न कृता होय । कहैं कवीर धन पाया सोय ॥

राग कान्हड़ा ७-भजन विन तीनों पन विगडे । चेतो रे नर
जीवन थोडा, काल करत नित झगडे ॥ टे० ॥ बालपना बालपन
खोये, अरू तरुण पन टेडे । बिरध भयो तब काल गरासे, अंध
होय निवेडे ॥ मन भुजंग मायाको मातो, बोलत है करडे ।
जबहिँ हंसा देत पयाना, मांढी होय निवडे ॥ मानुष देह धरि
काहेको, पशु न भया कहुरे । कहैं कवीर सुनो भाई संतो, कोई
संतहि ध्यान धरे ॥

राग कान्हड़ा ८-अब देखो विसरी गया इहाँ आय । अति मंद
मस्त मोह तन छाकै, फिरत लटेम कराय ॥ टेक ॥ जननीके गरभ
उरध मुख झूल्यो, तहाँ रहै दुख पाय ॥ अति संकट तहाँ भाठी
औटे, मलमै मूँड गडाय ॥ ता दिन तेरे कौन संग था, खान पान
पहुँचाय । जाको पिता प्रान पति कहिये, ताको क्यों विसराय ॥
अति मति हीन बुधि तुच्छ तनमै, सब विधि हाथ पराये । कहैं
कवीर मृग सर लागा, वालि विषैके खाये ॥