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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(७३६)

कवीरपंथी—

गगन गजा ॥ कहैं कवीर कछु संशय नाहिं, तत्त्व लखा जब
भ्रम भजा ॥

गौरी २४-संतो भाई हरिसा हीरा लाधा, देखत ही मन मगन
भयो है, गिन गिन गांठी बांधा ॥ टेक ॥ पल पल परखों छिन
छिन निरखों, राखूं छानै छानै ॥ भेद काहुपै मानू नाहिं, परचो
रंककै पानै ॥ तोल न मोल अमोलक कहिये, फोरेहु नहिं फूटे ॥
कहैं कवीर यह खुल गइ गठरी, खोले नहिं खूटे ॥

गौरी २५-जप जप अजपा जाप भला । सुरति न विसहं
एक पला ॥ टे० ॥ येही राह वहै सतगुरुकी, पंछी मारग मीन
चला ॥ हंसा मारग सोध चले हैं, जा खोजत जम मान दला ॥
सतलोक सतगुरुका आसन, सुरति निरतिकी बांधि कला ॥
अगम डोरि नगरीके निरंतर, मकर तार तहां सोधि चला ॥ भया
मुचेत सुरति लव लागी, कहैं कवीर जब होय भला ॥ सतगुरु
शब्द विलोय कह्यो है, मन छाडै जब नाम मिला ॥

गौरी २६-साधो भाई नाम ध्वजा फहराई । लोक वेदकी चाल
मिटाई, सो निज देखो आई ॥ टे० ॥ कहा पढै पंडित वेद पुराना,
भेद न हिरदे समाई ॥ खसम छोड़ि भयी बिबचारिनी, बातें करत
बनाई ॥ वेद पढै पुनि भेद न पावे, फिर फिर भटका खाई ॥
कोइ कोइ संत विवेकी विरला, रहै राम लव लाई ॥ नाम प्रताप
सदा सिर ऊपर, दर्शन पाय नसाई ॥ जाको काल सदा सिर
नावे, दूरि दूरि होय जाई ॥ कहूँ कहा कछु कहत न आवै, सब
घट रह्यो समाई ॥ नाम प्रतीति भई जाजनको कहैं कवीर समझाई ॥

गौरी २७-गुनका भेद न्यारा न्यारा, जानगो जानन हारा ॥
टे० ॥ सोई राज राजकुल मंडन, जाके मस्तक मोती ॥ और सकल
ये भार लदनियां मैहका सुतके गोती ॥ सोइ भुवंग जाके मस्तक