कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
हूँटि हम आये, निरगुन कोइ न बतावे । कहैं कवीर कोई दास
निज निर्गुनी, और सब लीला गावे ॥
गौरी १८—आपन पौ आपनहींमें पायो । शब्दही शब्द भयो
उजियारा, सतगुरु भेद बतायो ॥ टे० ॥ जैसे सुंदरी सुत लै सुती,
स्वप्ने गयो हेराय ॥ जाग परी पलंगपै पायो, ना कहूँ गयो ना
आय ॥ जैसे कुँवरि कंठ मनि हीरा, आभूषण विसरायो ॥ संगकी
सखी मिलि भेद बतायो, जिवको भरम मिटायो ॥ जैसे मृग
नाभि कस्तूरी, हूँदत बन बन धायो । नासा स्वाद भयो जब
वाके, उलटि निरंतर आयो ॥ कहा कहूँ वा सुखकी महिमा, ज्यों
गुंऐ गुड खायो । कहै कवीर सुनो भाई साधो, ज्योंका त्यों ठहरायो ॥
गौरी १९—राम विना कहु नाहिं साधो, राम विना कहु नाहिं ॥
रामहिं आगे रामहि पीछे, रामहिं बोले माहिं ॥ टे० ॥ उत्तर राम
दक्षिण राम, पूर्व राम पश्चिम रामा ॥ स्वर्ग पताल महीतल
रामा, राम सकल विसरामा ॥ ऊठत राम बैठत राम, जागत
सोवत रामा ॥ राम विना कहु और न दरसे, सकल राम के
कामा ॥ सब चराचर सम्पूर्ण रामा, निरखो शब्द सनेहि ॥
कायम सदा कदेहूँ नहि विनासै, बोलन हारा एहि ॥ एक रामको
भजे निरंतर, येक राम मिलि गावे ॥ कहैं कवीर रामके परसे,
आपा ठौर न पावे ॥
गौरी २०—आये राम भतारा, हम घर आये राम भतारा ।
ढुलहिन गावो मंगल चारा ॥ टे० ॥ तन रति करहु मन रति
करिहु पांचों तत्त्व बराती । राम हमारे पाहुन आये हम जोबन
मद माती ॥ शरीर सरोवर वेदी रचिहूँ ब्रह्मा वेद उचारा । राम
देव संग भावर फिरहु धनि बड़ भाग हमारा ॥ सुर तैंतीसों