कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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दिन दोय चार नाम भजि लेहू । काल अचानक खेहै ॥ कहैं
कवीर जगतका वासी । निकस पयाना देहै ॥
गौरी ३-मन रे जागत रहिये भाई । गाफल होय वस्तु मत
खोवै ॥ चोर सुसे घर जाई ॥ टे० ॥ षड् चक्रकी कनक कोठरी
वस्तु भाव है सोई ॥ ताला कुंजी कुलफ कर लागे उघड़त बार
न होई ॥ पांच पहरवा सोय गया है वस्ती जगवा जागी ॥ जरा
मरन व्यापै कछु नाहिं गगन मंडल लव लागी ॥ कर विचार
मन ही मन उपजी ना कहूँ गया न आया ॥ कहै कवीर संशय
जब छूटे नाम रतन धन पाया ॥
गौरी ४-डग मग छाड़ि दें मन बौरा ॥ अबतो जै बिन आवै
लीन्हो हाथ सिधौरा ॥ टे० ॥ पहिर जंजीर पैठि रन भीतर जूझ
मरे नहीं भागे ॥ जन्म मरनकी आशा छोड़ै सो पग धारे आगे ॥
होय निःशंक मग्न होय नाचो लोभ मोह भरम छाड़ो ॥ सूर कहाँ
मरन सो डरपै सती न सांचौ मांडौ ॥ अग्नि जै सो सती न
कहावे जूझ मरे नहीं सूर ॥ ब्रह्म अग्निमें यह तन होमैं सो पद
पावे पूरा ॥ लोक लाज कुलकी मरजादा येही गलेमें फांसी ॥
आगे होय पग पीछे धरि हैं होय जगतमें हांसी ॥ ये संसार
सकल जग मैला नाम भजे ते सूचा ॥ कहैं कवीर हरि भक्ति न
छांडो गिरत परत चढ़ि उंचा ॥
गौरी ५-नट होय नाच रे मन मेरा जो रीझै साहिब तेरा ॥
टेक ॥ ज्ञानको ढोल बजाय रैन दिन शब्द सुने सब कोई ॥ राह
केत गह जब कोपै जम घर बंधन होई ॥ द्वादश तिलक बनाये
बांस चढ़ि जग तजि होय रहो न्यारा ॥ सहस्र कला होय नाचे
मन मोरा रीझैगा साहेब प्यारा ॥ जो रीझै जगदीश जगतगुरु
देगा दान बुलाई ॥ भरी सभामें चोला बकसे फाटि कबू नहिं