कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कहरा ३३-तन धरि सुषिया कोई न देखा जो देखा सो दुखियारे ॥ ऊगन आथनकी बात कहत हौ सबका किया विवे-
षारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव दुखिया जिन यह राह चलाईरे ॥
सुखदेव आचारी दुखके कारन गरभहि माहि छपाईरे ॥ राजा
दुषिया रानी दुषिया एक दुषी धनहीनारे ॥ जोगि दुखी और
जंगम दुखिया कपटीको दुख दूनारे ॥ आशा तूष्णा सब घट
व्यापै कोइ महल नहीं सूनारे ॥ घाट वाट तो सब जग दुखिया
क्या गेही पटगीतारे ॥ कहे कवीर यह सब जग दुखिया कोई
संत सुखी मन जीतारे ॥
कहरा ३४-सतगुरु आइ करी निज दाया अब हम आया
चीन्हारे ॥ निज बुध रूप पिरापत नितही अचरज सहीछु
कीन्हारे ॥ ना हम मनुष देवता नाहीं ना गेही वन पंड़ीरे ॥
ब्राह्मन छत्री वेसहू नाहीं ना हम सूदर डंडीरे ॥ ना हम जोगी ना
हस जंगम ना हम तपी सन्यासी रे ॥ ना वैरागी ना ब्रह्मचारी
ना हम जपी उदासीरे ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख ना पंडित
न पोथीरे ॥ ना हम शायर ना मरजीवा ना हम सीप न मोतीरे ॥
ना हम गगन सुन्न भी नाहीं ना हम तेज न पानीरे ॥ मन बुधि
चित अहंकार भी नाहीं ना हम वेद न वानीरे ॥ ना हम अमर
मरै नहिं कबहुँ हम कवीर ज्योंका त्योंहीरे ॥ व्यास कपिल और
वामदेव ऋषि सबकी अनुभव यौहीरे ॥
कहरा ३५-ग्यान विचारन ग्यान विचारन ग्यान विचारन
जोगीरे ॥ रहै उदास सबसे सबहुनमें सुषमनि सुरति संजोगीरे ॥
जैसे कमल रहै जल भीतर जलसे रहत निनारारे ॥ ऐसे साधु
रहै जगमाहीं परम तत्व निखारारे ॥ जैसे धाइ बालको पोषै
अपनो जानत नाहीरे । करम करै करता न कहावै यौ साधु जग