कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
बिरहको बरा बनाइ जतन सौं पानी पूरन भिजावौं हो । हित करि
हेत हिये हिरदेसौं नीको बरा जिमावौं हो ॥ वकनाल सूधा कर
बौरी जिन इह बरा बनावौं हो । भाव कर भेटा शील कर सेमी
पापर आवा लावो हो ॥ याही तंतसैं हंसा आवै पहुचै लोक
हमारो हो । कहैं कवीर सुनो तुम साधो यह निज तंत समारो हो ॥
कहरा २४—अब नहीं तजौ भजौं नहीं कबहुँ जो था सो पहिचानैरे ।
करी करम भरम गति पाई भरम बिझका फूटा रे ॥ पाप पुत्रतैं
रहौ निरंतर करनी संसै छूटा रे । थाके जतन गये छुटि बंधन
विधि निषेध परिहरिया रे ॥ उत्तम मध्यम कासौं कहियै तत
अखंडित भरिया रे । चंचल अचल चलाचल थाके सुषमनि सुरति
समानी रे ॥ कहैं कवीर स्थिर पद दरसे मिटिगइ आवा जानीरे ॥
कहरा २५—ना मैं धर्मी ना मैं अधर्मी ना मैं कामी अकामीरे ॥
ना मैं श्रोता ना मैं वक्ता ना मैं सेवक स्वामीरे ॥ ना मैं गुपता
ना मैं सुक्ता ना निरबंधी सरबंधीरे । ना हम काहुते न्यारे रहते
ना काहुके संगीरे ॥ ना हम सुरग लोकको जाते ना हम नरक
सिधारै रे ॥ सबै करम हमहीने कीने हम करमनतैं न्यारैरे ॥ इह
विवेक कोई विरला बूझै जो सतगुरुको भेटैरे । मत कवीर काहुको
थापै मत काहुको भेटैरे ॥
कहरा २६—दिष्ट परैसौं मायारे दिष्ट परै सो मायारे ॥ वह तो
अचल अलेष एक है दिव्य दिष्टि मैं आयारे ॥ सतगुरु दियो
लखाई आपमें है माही सत सोईरे । दूजो किरतम थापि लियौ
है मुक्ति कहांते होईरे ॥ काया पराई त्रिगुन ततकी विनसि
जाई छिन माहीरे । निरगुन ब्रह्म लखौ घट अंतर जो विनसनमें
नाहीरे ॥ ऐसे सदा देहगति सबकी महरम कोई उचारैरे ।
आपही होइ न्यायी करि न्यारो इहि विधि माया विचारैरे ॥