कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
सब फिरि आया कहुँ न पाया किनी तपसी की भेसारे ॥ तीरथ
वरत बहु विधि कीना धूप शीत तन गारारे । तेरे कारने मेरे मन
मोहन पांचो इंद्री जारारे ॥ सरवन सुनले विषकी बातें अब इम-
रत चितधारारे । नाहीं विषकी वास सुहाती अब सत सबद
सुवासारे ॥ नैन विषै रस माते फिरते अब निज रूप निहारारे ।
जिभ्या षट रससे लुभानी अब तो नाम रस पीयारे ॥ पांचो
इन्द्री विषै रस मानी लाज कान नहीं कायारे ॥ त्रिपति भई
सब पांच पचीसौ घरही बैठे आयारे ॥ गुर गम नाम अमीरस
प्याया पियत परमपद पायारे । दास कवीर सुषमना वासी
गगन पयाना दीयारे ॥
कहरा २०-धागा टूटा गगन विनसि गया हंसा कहाँ समाई
रे । इह अचरज मोहि निसि दिन व्यापै कोई न कहै समझाईरे ॥
धर नाहीं घरन नाहीं धरावन हारा नाहीरे । इंगला पिंगला
सुषमन नाहीं यह गुन कहाँ समाहीरे ॥ सबद अतीत रहै संग
रमता यह गुन कहाँ समाईरे । टूटी जुरै जुरी फिरि टूटै जब
तब होइ विनासारे । तबको साहिब अबको सब कहु काको
बिसवासारे । सीषै सुनै कहै कहा होई जो नहि पढ़िँ समानारे ।
कहैं कवीर गगन नहि विनसै यौ धागा उन मानारे ॥
कहरा २१-सुनौ सियानी अकथ कहानी पिय अपनेका लेवो
रे । जो धन तुमको पियने सौंपा सो धन बाद न पौवो रे ॥ गहि
मारै और धरि झिझकारै कैसे सहो कसौटीरे ॥ जो मारौ तो
पाउ न टारौ अबै सुरति लौ लाऊरे ॥ घरमै रहौ कै आँगन ठाढी
सतसौ नेह न छांडौरे ॥ कागद गुडिया सरग उडानी सुरति डोरि
मति डांडौरे ॥ जो कबहुँ छुटि जाइ हाथसौ तो सुख नींद न
सोवौरे ॥ एक सतवंती पिय संग गवना रहत पियाके संगारे ॥