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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७१९)

द्विष्ट मुष्ट तँ अगम अगोचर ऐसा गढका राजारे ॥ कोट गियान
सबद तहाँ उचरै सुनौ सत परवानीरे ॥ कहैं कवीर बद्र नहि
चीन्है बादकी करावे ग्यानीरे ॥

कहरा ९-संसा मेटि लगे गुरचरनौ सतनाम मुख बोलौरे ॥
या तरवर एक बसे पखेरु आ चुगत जुगन लिये डोलैरे ॥ यह
पंछी कोई मोहि बतावे जो घट माहीं बोलैरे ॥ याकी संधि
लखै जन कोई कौन ठमहि बोलैरे ॥ आवै संझ उडि जाइ सवेरा
गम न काहू देवैरे ॥ दरमत छाँड अनंद घर छावै पंछी बसेरा
लेवैरे ॥ दूइ फल चाखि नषर वह आगै और नहि दस दीसारे ॥
कहै कवीर साध कोई जाने सतनामकी आशारे ॥

कहरा १०-सुनो संत इक निरगुन कहरा महरा होय सो
बूझैरे ॥ तनसे न्यारा मनहुसे न्यारा देउ द्विष्ट होइ सूझैरे ॥
विन नैनन जहाँ सब कछु दीखै विन सरवन सुनै वानीरे । विना
नाशिका वास सुवासा घट रस पावै ग्यानीरे ॥ विना जिभ्या
जहाँ अमृत भोजन विन इंद्दी संजोगारे । पांच पचीस जहाँ हैं
नाहिंनहीं संजोग बिजोगारे ॥ रूपरेख विन निरगुननामा सत गुरु
लखावैरे । कहैं कवीर नामकी महिमा ग्यानी होय सो पावैरे ॥

कहरा ११-वा घरकौ कोई मोहि बतावो जा घरसैं ब्रह्म
आयारे ॥ काया छाँडि चले जब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥
मैं मेरी ममताके काजैं बारहिबार ठगायारे । समझ न परत
ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ अब मेरी
प्रीति नामसौं लागी उलटि निरंतर धायारे ॥ सहजै सुषुमनि
पाउ पलौटे निज धनी अपनायारे ॥ नहीं जहाँ चंद्र नहीं जहाँ
सुरा जहाँ जाइ मठ छायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि माहीं
सहजै सहज समायारे ॥