कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 968 में से
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वाटचो । ज्ञान उदय जिमि चंद ॥ थाके चंद सुरगुन मारुत ।
वहै न जमना नीर ॥ सुनि सुनिवरको ध्यान डिग्यो है । बछा
न पीवै क्षीर ॥ घट घट रास रच्यो वृन्दावन । घट घट गोपी
कान्ह ॥ घट घट राम रमे अविनाशी । जाने कोई संत सुजान ॥
सतगुरुके प्रताप सखीरी । वरनि सुनायो रास ॥ मानुष जन्म
सुफल भयो साधो । विं धनि धरमदास ॥
धमार १७—अहो अविनाशी दूलहा कब मिलिहो हो ॥ हो
भाई साधो मिलिहो सनेही आय ॥ टेक ॥ जल उपजे जलसो
नहिं नेहा, रटत पियास पियास । मैं विरहिन ठाढी मग जोहों,
पिया मिलनकी आस ॥ दिन नहिं चैन रैन नहिं निद्रा, घर अंगना
न सोहाय । सेजरिया बैरन भइ हमको, जागत रैन बिहाय ॥
हूं तो तुम्हरी दासी साहब, तुम हमरे भरतार । दीन दयाल
दया करो जन पर, साहब सिरजन हार ॥ आमिनकी बिनती
सुन साहब, रहूं चरन लौ लीन ॥ तुम बिन जियरा ऐसे तलफे,
जैसे जल बिन मीन ॥ की हम प्रान तजत हों साहब, की आपन
कर लेव । साहब कवीर बिरह रस भोगी हमहूं को दर्शन देव ॥ १ ॥
धमार १८—अहो ऐसे गुरु संग, होरी खेलिये हो हो ॥ हो
भाई साधो हो, जरा मरन भ्रम जाय ॥ ज्ञान जुगतकी कर
पिचकारी, छमा चलावन हार । आतम ब्रह्म संग खेलन लागे,
पांच पचीस मंझार ॥ ज्ञान गलीमें खेलैं होरी, मची प्रेमकी
कीच । लोभ मोह दोउ कुटि कुटि मैं, सुनि सुनि शब्द अजीत ॥
त्रिकुट महलमें बाजा बाजे, हौ छतीसो राग । ज्ञान ध्यान दोउ
देखै तमाशा, सतगुरु खेलैं फाग ॥ ईगला पिंगला सुषुमन
रोको, सुरति निरति दोउ नार । अपने पिया संगहोरी खेलो,
लजा कान निवार ॥ सुन्न महलमें होत कुतूहल, करहिं राग