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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७०७)

ठाढे गढौ भयो हो । लोचन ललित अंजाय ॥ हरि अविनाशी
उबरे हो । कहै कवीर गुण गाय ॥

धमार १२-भरम भुली माया जग मोहै हो । अहो मेरो साधो
खेलत भ्रमको ख्याल ॥ टेका ॥ कटि केहरि गज गामिनी माया ।
संशय कियो सिंगार ॥ राखे रोकि सब मोह नदीमें कोऊ न
उतरचो पार ॥ ब्रह्माको चित्त चोर लियोहै । शिवको लीन्हों
साथ ॥ बस किय विष्णु विश्वके ठाकुर इंद्र नवायो माथ ॥
तैंतीस कोटि छले सुनि देवा । डारचो भरम गुलाल ॥ बरन
फेरि अवरन होय नाची । ऐसी अलबेली नारि ॥ पंडित आविन
आँजन आँज्यो । मूरख आँखिन धूरि ॥ जती सती सब बाँसन
मारे सुरनर सुनि किय चूर । गोपीचंद भरथरी गोरख । खेलन
आये फाग ॥ शृंगी ऋषि पाराशर लुटे ॥ छांडि छांडि वैराग ॥
सात दीप नौखंड तिहुपुर । फगवा सब सो लीन ॥ ठाढी विनती
करै कबीरसों, हम तुमरे आधीन ॥

धमार १३-तुम दीन दस खेलों साजना हो । अहो मेरो सेतो
बहुरि न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ रिनु वसंत माया संजोरी । कछुक
करो अनुराग ॥ फिरि पीछे पछतावगे संतो बीति जायगी फाग ॥
ग्यान डगा तुम रोपि हो । सन्मुख रहो सम्हारि ॥ मारेगी
चित्त चोरकै हो । मोहिनि चंचल नारि ॥ हरि सुभिरनकी गारी
दीजै । गुरुकै वचन संम्हारि ॥ साधु संगति तुम जोरिकै हो ।
कबहुं न आवेगी हारि ॥ अनहद बाजा बाजे सखीरी । नौतम
प्रीतम ठाय ॥ केशरि चरचो प्रेमकी हो । जुग जुग रंग न जाये ॥
कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । तीन तीसको मारि ॥ नाम गहेते
परम पद पड़ये । आवागमन निवारि ॥

धमार १४-कर मन संग भरमत केई जुग गये । अहो मेरो