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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(७०१)

पग लाग री॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । पीव अपने संग
लाग री ॥ पांच अमृत भोजन लेवै । प्रेम प्रीति भरि थार री ॥
महा प्रसाद संत सुख पावे । आनि खुले मेरे भागरी॥ चौरासीकी
बंध छुड़ावन । आये सतगुरु आपरी॥ पान प्रवाना देत जीवनको ।
वे पावैं सुख वास री॥ चोवा चंदन अरगजा कुमकुम । पुहुप माल
गल हार री ॥ फगुवा माँगि मुक्ति फल लेवौं । जीव अपनेके
काजरी॥ सोलहो सिंगार बत्तीसो आभरन । सुरति सिंगार सँवौररी॥
संत कवीर मिले सुख सागर । आवा गवन निवार री ॥

फाग २-मिलि खेलो विमल वसंत । प्यारे कँत सों ॥ खेली
अंधेरी कोठरी मन । बैठो महल इकंत॥ टेक॥ गगन महल दीपक
धरा हो । भवन कियो उजियार ॥ छैल छबीलौं ना छीपै । मेरे
जीवन प्रानाधार ॥ विन पग नटवा निरति होत है । विन कर
बाजे तार ॥ विन नैन जहाँ देखिये । विन श्रवण सुनि झन्कार॥
गढ़ जमुनके अंतर है । चंद सुरजके बीच॥ अरध उरधकी संधिमें ।
जहाँ मची अरगजा कीच ॥ रंग सुरंग रङ्ग रंगि रहे हो । हिलि
मिली एकै ठाँह॥ धर्मनी भेटे भावसों हो । मिले पुरातम नाह॥

फाग ३-जहाँ मन पावे विसराम, संगति साधुकी । साधु संत
मिलि होरी खेलो, निशि दिन आठों जाम ॥ टे०॥ होरी हरिको
नाम है हो । लीजिये गाय बजाय ॥ फगवा बारह मास है हो ।
तुम मति विसरो ताहि ॥ पिचकारी नासा बनि हो । स्वासा
कैसर रंग ॥ भरि भरि डारै सुषमना । धुनि अनहद ताल मृदंग॥
तीन रंग एकै भयो है । पीत श्याम अरु सेत॥ होरी खेले आत्मा ।
परमात्म कंत समेत॥ कवीर बलि गुरुदेवकी । पद परसत राजा
राम॥ जापर दया भई सतगुरुकी । जुग जुग अविचल धाम॥३॥