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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(६९९)

निशान ॥ घर घर सत्य शब्द जो फैले, सतजुग बरते आन ।
साहब कवीर आये निज घरसो, फगुवा दीन्हे नाम ॥ निरगुन
भगतीरूप कलजुगमें, वेद मरम नहिं जान ॥

होरी ४५—मेरे मन परदेसी मीत, होरी खेलिये ॥ जब जैहो
घर आपने, तब कौन तुम्हारे साथ ॥ टेक ॥ बाहिर खेलन नाहीं
पैहो, आनि गहे जमराज । बांह पकर जम ले चले, धरी रहे सब
साज ॥ जो तुम काज आपनो चाहो, नाम गहो बहु भांत ।
अजहुं चेत अचेत बावरे, जन्म सिरानो जात ॥ ज्ञान पुटरिया
बांधके हो, सुरत अबीर उडाव । जाय लगे पियके हिये, अब
खेलनको दाव ॥ पांच नार तुमको सजी, पांच हुए के जात ।
वे रस चाहें आपनी, अपनी अपनी भांत ॥ साहब कवीर होरी
रचो, मचो कुलाहलसोर । समझ देख नरबावरे, येतो होरी कैसे मोर ॥

होरी ४६—तेरो है घर कंथ सुजान, खेलो रंग भरी । जनम
जनमकी मिटी कल्पना, पायो जीवन प्रान ॥ टेक ॥ पांच सखी
मिल मंगल गावैं गुरुगम शब्द बिचार । बाजत ताल मृदंग
झांझ डफ, उठत शब्द झनकार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके,
तनकी तपन बुझान । पिचकारी छूटे अति अदभुत, रसके कीच
बहान ॥ सतगुरु मिल आपा बिसरावैं, लागी खेल अपार । जित
कित होहो होय रही, रटना लगी हमार ॥ सुख सागरमें न्हाइये,
निरमल भये शरीर । आवागमन तब मेटिया, जब फगुवा पाये
कवीर ॥

होरी ४७—तज काम क्रोध मद मोह होरी खेलिये ॥ टेक ॥
ज्यों पंकज जलमें रहे, जल नहिं परसत देह । उर माया मन
परहरी, सतगुरुसे कर नेह ॥ ज्ञान सुगंध गोद भर लीजे, कुबुध
गुलाल उड़ाय । सत्यनाम गुन गाइये, जश को डफ बजाय ॥